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35,000 रुपये पाने वाला जवान और 7-स्टार वाले मौज उड़ाने वाले — असली देशभक्त कौन?

एन. सिंह · ·5 मिनट

ज़रा दो अलग-अलग दुनियाओं की तुलना कीजिए।

पहली दुनिया है सियाचिन और लद्दाख की बर्फीली चोटियों की: वहाँ तापमान शून्य से 30-40 डिग्री नीचे है। खून जमा देने वाली हवाएं चल रही हैं। उस वीराने में 20-22 साल का एक नौजवान हाथ में राइफल लिए, अपनी जान हथेली पर रखकर 24 घंटे जाग रहा है। वह किसी गरीब किसान या मजदूर का बेटा है। उसे महीने के सिर्फ 30 से 35 हज़ार रुपये मिलते हैं। यदि दुश्मन की कोई गोली उसे लग जाए, तो वह तिरंगे में लिपटकर अपने गाँव लौटता है और पीछे रोते हुए माँ-बाप और छोटे भाई-बहन छूट जाते हैं।

अब दूसरी दुनिया देखिए बड़े शहरों के 7-स्टार होटलों और कॉरपोरेट क्लबों की: वहाँ एयर-कंडीशनर की ठंडी हवा में महँगी शराब की बोतलें खुलती हैं। एक-एक रात के डिनर का बिल उस सैनिक की पूरे महीने की तनख्वाह से ज़्यादा आता है। वहाँ वे लोग बैठे हैं जो करोड़ों रुपयों की टैक्स चोरी करते हैं, सरकारी ज़मीनें हड़पते हैं और जब राष्ट्रगान बजता है तो छाती फुलाकर खड़े हो जाते हैं और खुद को देश का ‘सच्चा कर्णधार’ कहते हैं!

अब आप अपने दिल पर हाथ रखकर बताइए: इस भारत का असली रक्षक और असली मालिक कौन है? वह 35 हज़ार रुपये पाने वाला त्यागी जवान, या सेवन-स्टार होटलों में मौज उड़ाने वाले ये परजीवी?


शहादत पर घड़ियाली आंसू और चार साल का संविदा!

हमारे देश की विडंबना देखिए कि जब कोई जवान शहीद होता है, तो नेताओं में उसके घर जाकर फोटो खिंचवाने की होड़ लग जाती है। टीवी पर दो दिन तक देशभक्ति के गाने बजते हैं। लेकिन जैसे ही कैमरा हटता है, वह परिवार अपनी बदहाली से जूझने के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है।

हैरानी की बात यह है कि जो नेता और बड़े अफसर खुद 60 साल तक पक्की नौकरी, मोटी पेंशन, मुफ्त सरकारी बंगले, गाड़ियां और हवाई यात्राएं भोगते हैं—वे देश की रक्षा करने वाले नौजवानों के लिए ऐसी योजनाएं बनाते हैं जहाँ 4 साल बाद 75% जवानों को बिना किसी पेंशन या सामाजिक सुरक्षा के घर वापस भेज दिया जाता है!

लेखक एन. सिंह इस अवसरवाद की तुलना ‘मक्खियों’ से करते हैं। मक्खी वह जीव है जिसे केवल गंदगी और चाशनी से मतलब होता है; उसे समाज के घावों से कोई हमदर्दी नहीं होती। आज का सत्ताधारी और अभिजात्य वर्ग ठीक उसी तरह देश के संसाधनों को चूस रहा है और सेना के त्याग को केवल अपने भाषणों का मसाला बना रहा है।


किताब से कड़वा सच

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के 16वें और 24वें अध्याय में इस पाखंड पर कठोर प्रहार करते हुए लिखते हैं:

“35000 रुपये प्रतिमाह तनख्वाह पाने वाला एक गरीब का लड़का, जिसको ये लोग अपना नौकर समझ रखे हैं, इनके लिए सीमा पर तो जग ही रहा होगा। यह अब भारत के अधिकांश पश्चिमी विचार रखने वाले भारतीयों के दिमाग में छा गया है और एक-दूसरे से ऐसा ही व्यवहार करते हैं, नैतिकता का लोप हो चुका है, भौतिकता भयंकर रूप से इन पर हावी है, सेना के प्रति इनका कोई सम्मान नहीं रह गया है, केवल नारे लगा देना और उनकी शहादत पर कुछ अफ़सोस के शब्द ऊपरी मन से बक देना इनकी आदत में शुमार हो गया है। उस समय भी इन्हें 7 स्टार होटल, इनकी गाड़ियां, इनकी दौलत या कुछ भी न हों, तो इनकी कामुक वासनाएं इनके मन को हमेशा सतरंगी बनायी रहती हैं।”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 7363)

वे आगे लिखते हैं:

“35000 रुपये तनख्वाह पाने वाला सैनिक 4 वर्ष के लिए सरहद पर मातृभूमि की रक्षा के लिए अब जा रहा है। देश का आनंद लूटने के लिए ये मक्खियाँ 60 वर्ष के लिए नौकरी का इंतजाम कर रही हैं। नेतागण भी चुप हैं, क्योंकि सरकार हो या विपक्ष; बिरादरी तो एक ही है न। अपनी ही कही हुई बातों में आदमी मुकर जाते हैं।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 6234)


असली सम्मान का पैमाना

  1. सैनिकों को संपूर्ण सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा: देश की रक्षा करने वाले किसी भी जवान की सेवा को किसी अनुबंध या संविदा (Contract) की दया पर न छोड़ा जाए। उसे स्थायी पेंशन और सम्मानजनक भविष्य मिले।
  2. नेताओं और अफसरों के विशेषाधिकारों में कटौती: जो नेता देश की सुरक्षा में एक दिन नहीं खपते, उनके भत्तों और पेंशनों को तत्काल कम किया जाए और उस धन को सैनिकों के कल्याण में लगाया जाए।
  3. शहीद परिवारों का स्थायी पुनर्वास: किसी सैनिक के बलिदान के बाद उसके परिवार को केवल एक चेक देकर पल्ला न झाड़ा जाए, बल्कि उसके बच्चों की शिक्षा और परिवार के भरण-पोषण की शत-प्रतिशत ज़िम्मेदारी राज्य उठाए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या किसी देश का अस्तित्व तब तक सुरक्षित रह सकता है जब तक उसके जवानों और किसानों का शोषण करके मुट्ठी भर चापलूस ऐश करते रहें?

भारतीय सेना के मान-सम्मान, अग्निवीर जैसी योजनाओं के अंदरूनी दर्द और राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर संकट को जानने के लिए विमला सिंह और एन. सिंह की पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का 16वां और 24वां अध्याय ज़रूर पढ़ें।

35000 रुपये तनख्वाह पाने वाला सैनिक 4 वर्ष के लिए सरहद पर मातृभूमि की रक्षा के लिए अब जा रहा है। देश का आनंद लूटने के लिए ये मक्खियाँ 60 वर्ष के लिए नौकरी का इंतजाम कर रही हैं।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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