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गिनती से सत्ता तक
(भारत का अनकहा युद्ध)
Ginti Se Satta Tak (Bharat Ka Ankaha Yuddh)
भारतीय लोकतंत्र में संख्या बल, जातीय समीकरण, जनगणना और चुनावी गणित किस तरह सत्ता के वास्तविक हथियार बन चुके हैं—यह पुस्तक भारत के इसी अनकहे युद्ध का निष्पक्ष और गहरा विश्लेषण करती है।
| आवरण पर लेखक | एन. सिंह (N. Singh) |
|---|---|
| प्रकाशक | BFC Publications, Lucknow |
| ISBN | 978-8165270803 |
| श्रेणी | समकालीन राजनीति एवं लोकतंत्र |
| प्रारूप | पेपरबैक |
| पृष्ठ | 257 |
| प्रकाशन तिथि | 13 सितंबर 2026 |
| मूल्य | ₹299 |
पुस्तक के बारे में
भारत सरकार ने जातीय जनगणना का आदेश जारी किया है, तो सवाल उठता है—क्या जातीय जनगणना सामाजिक न्याय की कुंजी है, या राजनीति का नया हथियार? भारत में ‘जाति’ एक ऐसी सच्चाई है जिसे हम जानते तो हैं, लेकिन स्वीकारने से बचते हैं। हम आधुनिकता की बात करते हैं, पर हमारे निर्णय आज भी जाति से प्रभावित होते हैं।
यह पुस्तक आपको कहाँ ले जाती है
- जाति की उत्पत्ति और उसके स्थायित्व की कहानी तक
- पूना पैक्ट जैसे ऐतिहासिक मोड़ों के विश्लेषण तक
- आरक्षण, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की जटिल बहसों तक
- और अंततः जातीय जनगणना के उस प्रश्न तक, जो आज भारत की राजनीति के केंद्र में है
अधूरी जातिगत जनगणना आँकड़ा नहीं, भ्रम है।
केवल गिनती काफ़ी क्यों नहीं
लेखक का तर्क है कि यदि जनगणना में केवल यह गिन लिया जाए कि किस जाति की कितनी संख्या है, तो वह मात्र सांख्यिकीय जानकारी होगी, सामाजिक यथार्थ नहीं। समाज की वास्तविक स्थिति समझने के लिए औसत आय, घर-भूमि-संपत्ति, सरकारी और निजी क्षेत्रों में भागीदारी, शिक्षा का स्तर और पीढ़ीगत सामाजिक गतिशीलता के आँकड़े भी ज़रूरी हैं।
यह पुस्तक न किसी के पक्ष में है, न किसी के विरोध में। यह एक संतुलित लेकिन स्पष्ट दृष्टिकोण रखती है—जहाँ सवाल कठिन हैं, लेकिन ज़रूरी हैं।
इस पुस्तक से उपजे लेख
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गणना से समृद्धि तक — भारत को सचमुच महाशक्ति बनाने का रास्ता क्या है?
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पूना पैक्ट 1932 — गांधी और अम्बेडकर का वो समझौता जिसने राजनीति बदल दी
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मंडल से पंचायत तक — गाँव में सत्ता आई या गाँव टुकड़ों में बँट गया?
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