गिनती से सत्ता तक
Ginti Se Satta Tak (Bharat Ka Ankaha Yuddh)
भारतीय लोकतंत्र में संख्या बल, जातीय समीकरण, जनगणना और चुनावी गणित किस तरह सत्ता के वास्तविक हथियार बन चुके हैं—यह पुस्तक भारत के इसी अनकहे युद्ध का निष्पक्ष और गहरा विश्लेषण करती है।
आज़ाद कलम • चिंतनशील आवाज़
आज़ाद कलम सामाजिक मुद्दों और उन सवालों पर बात करता है, जिन पर अक्सर खुलकर चर्चा नहीं होती।
यहाँ किसी विचारधारा या पक्ष का प्रचार नहीं, बल्कि सवाल, विचार और संवाद की जगह है।
क्योंकि सवाल करना विरोध नहीं, समझने की पहली सीढ़ी है।
एन. सिंह की कृतियाँ
समकालीन राजनीति, बुद्धकालीन इतिहास और ग्रामीण भारत—तीन धाराएँ, एक सवाल: हम अपने समाज को कितना समझते हैं?
Ginti Se Satta Tak (Bharat Ka Ankaha Yuddh)
भारतीय लोकतंत्र में संख्या बल, जातीय समीकरण, जनगणना और चुनावी गणित किस तरह सत्ता के वास्तविक हथियार बन चुके हैं—यह पुस्तक भारत के इसी अनकहे युद्ध का निष्पक्ष और गहरा विश्लेषण करती है।
Buddhakalin Shakya Se Sainthavar Tak Yatra
भगवान बुद्ध के कालखंड के प्राचीन शाक्य और मल्ल गणराज्यों से लेकर पूर्वांचल के वर्तमान सैंथवार-मल्ल समाज तक की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक यात्रा का प्रामाणिक शोध।
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भारतीय सभ्यता, समतामूलक समाज और तार्किक चिंतन के निर्माण में बुद्ध धम्म के ऐतिहासिक योगदान और आधुनिक भारत में उसकी प्रासंगिकता पर गहन विमर्श।
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घाटे का सौदा बनती भारतीय कृषि, पलायन का दंश झेलते गाँव और किसान की बेबसी के पीछे छिपे नीतिगत कारणों की ज़मीनी पड़ताल।
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सैंथवार और मल्ल समुदाय की ऐतिहासिक जड़ों, प्राचीन गणतांत्रिक परंपराओं और सामाजिक पहचान पर आधारित एक विस्तृत और दस्तावेज़ी ऐतिहासिक कृति।
Bharat 2047
आज़ादी के शताब्दी वर्ष 2047 के सरकारी दावों बनाम शिक्षा, रोज़गार, असमानता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की ज़मीनी हकीकत का तुलनात्मक अध्ययन।
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विविधताओं से भरे भारत के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विरोधाभासों को उजागर करती एक विचारोत्तेजक पुस्तक।
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प्रकृति के अंधाधुंध दोहन, जलवायु संकट और पर्यावरणीय विनाश के बीच मनुष्य की संवेदनहीनता पर एक गंभीर चेतावनी।
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नारेबाज़ी और दिखावटी राष्ट्रवाद की आड़ में दबते जन-सरोकार, पर्यावरणीय संकट और आर्थिक चुनौतियों पर बेबाक कलम।
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वीडियो संवाद
ज़मीनी सवालों पर सीधा संवाद—किसान, लोकतंत्र, जनगणना और समाज।
किसान और गाँव
ज़मीन के काग़ज़ और अदालत के नोटिस हाथ में लिए किसान आख़िर किस दरवाज़े पर न्याय माँगे? खेती के संकट, क़र्ज़ और क़ानूनी उलझनों के बीच फँसे अन्नदाता की आवाज़।
लोकतंत्र और सत्ता
पढ़िए और साझा कीजिए
क्योंकि सवाल करना विरोध नहीं, समझने की पहली सीढ़ी है।
अधूरी जातिगत जनगणना आँकड़ा नहीं, भ्रम है।
‘पवित्रता’ लोकतंत्र की आत्मा है और अनुशासन उसका शरीर।
1 मिनट पढ़ने का समय
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सोचिए • समझिए • सवाल कीजिए
—— लोग | विचार | एक बेहतर समाज की ओर

लेखक परिचय
एन. सिंह—जिन्हें नथुनी सिंह और नथुनी सिंह कोदन्ना के नाम से भी जाना जाता है—हिंदी के लेखक, सामाजिक इतिहासकार और समकालीन राजनीति के टिप्पणीकार हैं।
पूर्वांचल के शाक्य-मल्ल और सैंथवार समाज पर ऐतिहासिक शोध से शुरू हुई उनकी लेखनी आज लोकतंत्र, जनगणना, कृषि संकट और राष्ट्रवाद जैसे राष्ट्रीय प्रश्नों तक पहुँची है। आज़ाद कलम उनका मंच है और चिंतनशील आवाज़ उनका वीडियो संवाद।
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