85 बनाम 15 का नारा — क्या सिर्फ सिर गिनने से पेट भर जाता है?
एन. सिंह · ·4 मिनट
मान लीजिए किसी मोहल्ले में 100 लोग रहते हैं। उनमें से 85 लोग एक तरफ खड़े हो जाएं और 15 लोग दूसरी तरफ। 85 लोगों के नेताजी माइक पर चिल्लाकर कहें—“हम 85 हैं, इसलिए इस पूरी बस्ती का सारा सामान और सारे फैसले हमारे हाथ में होने चाहिए!”
पहली नज़र में यह बात बहुत दमदार लगती है। संख्या का गणित यही कहता है। लेकिन अब ज़रा उस 85 लोगों की भीड़ के अंदर जाकर देखिए।
उस 85 लोगों में 5 लोग ऐसे हैं जिनके पास पक्के मकान हैं, गाड़ियां हैं और वे अपने बच्चों को बड़े स्कूलों में पढ़ाते हैं। बाकी के 80 लोग दिन-रात धूप में पसीना बहाते हैं, रिक्शा चलाते हैं, खेत में कुदाल चलाते हैं और शाम को रूखी-सूखी रोटी खाकर सो जाते हैं। जब भी कोई फैसला होता है या सरकारी सुविधा आती है, तो वही आगे खड़े 5 लोग सब कुछ हड़प लेते हैं और बाकी 80 लोगों से कहते हैं—“तुम चिंता मत करो, हम 85 हैं, हमारी जीत हो गई!”
क्या उन 80 गरीब परिवारों का पेट सिर्फ इस नारे से भर जाएगा? आज भारतीय राजनीति में “85 बनाम 15” का नारा ठीक इसी मोड़ पर खड़ा है।
नारे का आकर्षण और ज़मीनी धोखा
हमारे देश के राजनीतिक मंचों पर ‘85 बनाम 15’ का सूत्र कोई नया नहीं है। इसका सीधा मतलब यह बताया जाता है कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अल्पसंख्यक मिलकर देश की आबादी का लगभग 85% हिस्सा हैं, जबकि सवर्ण जातियां करीब 15% हैं।
यह नारा सामाजिक न्याय के नाम पर दिया जाता है। इसका मकसद ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को सत्ता और नौकरियों में उनकी आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी दिलाना बताया जाता है।
लेकिन लेखक एन. सिंह पूछते हैं कि क्या भारतीय समाज इतना सरल है?
सच्चाई यह है कि इस तथाकथित ‘85%’ के भीतर हज़ारों जातियां और उपजातियां हैं। क्या एक सम्पन्न, ज़मींदार या दबंग पृष्ठभूमि वाले पिछड़े वर्ग के नेता की स्थिति उस गरीब बुनकर, कुम्हार, लोहार, मल्लाह या सफाईकर्मी जैसी हो सकती है? बिल्कुल नहीं! जब भी 85% के नाम पर सत्ता मिलती है, तो उस 85% का मलाईदार तबका सारी कुर्सियों पर काबिज हो जाता है। जो सबसे नीचे था, वह सिर्फ ताली बजाने और वोट देने के लिए इस्तेमाल होता रहता है।
किताब से कड़वा सच
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ में इस नारे का बारीकी से चीर-फाड़ करते हुए लिखते हैं:
“‘85 बनाम 15’ का विचार इस धारणा से निकलता है कि भारतीय समाज में लगभग 85 प्रतिशत आबादी उन वर्गों की है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से वंचित या कम प्रतिनिधित्व वाला माना गया है… लेकिन खतरा भी यहीं है—अगर इस नारे को अत्यधिक सरल रूप में प्रस्तुत किया गया, तो यह समाज को एक नए प्रकार के ध्रुवीकरण की ओर भी ले जा सकता है। इसीलिए ‘85 बनाम 15’ को न तो पूरी तरह खारिज किया जा सकता है, न ही इसे अंतिम सत्य माना जा सकता है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 2029 व 2045)
वे आगे लिखते हैं:
“‘85 बनाम 15’ यदि स्थायी युद्ध का सूत्र बनता है, तो वह संविधान की आत्मा के विरुद्ध है। पर यदि उसे ऐतिहासिक असंतुलन सुधारने की चेतावनी समझा जाए, तो वह लोकतंत्र की प्रक्रिया का हिस्सा है… यदि ‘85 बनाम 15’ स्थायी मानसिकता बन जाए, तो लोकतंत्र प्रतिस्पर्धी गुटों का संघर्ष बन सकता है।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 2083 व 2884)
असली न्याय की राह क्या है?
- संख्या नहीं, संसाधन और शिक्षा: सिर्फ संख्या का ढोल पीटने से किसी का जीवन नहीं सुधरता। जब तक 85% के भीतर मौजूद सबसे पिछड़े और गरीब तबके के बच्चों को मुफ्त और बेहतरीन शिक्षा नहीं मिलेगी, तब तक वे बराबरी में कभी नहीं आ पाएंगे।
- आंतरिक न्याय की मांग: वंचित वर्गों के युवाओं को अपने ही नेताओं से पूछना चाहिए कि जब आप सत्ता में आते हैं, तो आपकी अपनी जाति के सबसे गरीब भाई के घर में नल और बिजली क्यों नहीं पहुँचती?
- राष्ट्र को युद्धक्षेत्र बनने से बचाना: 85 बनाम 15 को यदि स्थायी सामाजिक नफ़रत का हथियार बना दिया गया, तो भारत कभी एक मजबूत राष्ट्र नहीं बन पाएगा। न्याय का मतलब सबको साथ जोड़ना है, किसी एक वर्ग के खिलाफ स्थायी युद्ध छेड़ना नहीं।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या लोकतंत्र केवल सिर गिनने की मशीन है या दिलों को जोड़ने और भूखों को रोटी देने की व्यवस्था?
85 बनाम 15 के राजनीतिक गणित, मंडल आंदोलन के बाद उभरी जातियों की आंतरिक लड़ाइयों और सत्ता के इस अनकहे खेल को समझने के लिए एन. सिंह की किताब ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का नौवां अध्याय हर सजग नागरिक को जरूर पढ़ना चाहिए।
‘85 बनाम 15’ यदि स्थायी युद्ध का सूत्र बनता है, तो वह संविधान की आत्मा के विरुद्ध है। पर यदि उसे ऐतिहासिक असंतुलन सुधारने की चेतावनी समझा जाए, तो वह लोकतंत्र की प्रक्रिया का हिस्सा है।