सोचिए • समझिए • सवाल कीजिए

Azaad Kalamसवाल • विचार • संवाद
← विचार एवं लेख

'आधे सच' का समाज — हम जाति मानते भी हैं और बात करने से डरते भी हैं

एन. सिंह · ·4 मिनट

आप जब भी अपने दोस्तों या रिश्तेदारों के बीच बैठते होंगे, तो अक्सर यह बात सुनने को मिलती है—“अरे भाई! अब तो 21वीं सदी आ गई है। अब कौन जाति-पाति मानता है? सब पढ़े-लिखे हैं, सब बराबर हैं।”

सुनने में यह बात बहुत अच्छी लगती है। लेकिन क्या यह पूरा सच है?

ज़रा ईमानदारी से सोचिए। अगर घर में किसी बड़े भाई या बहन की शादी तय होनी हो, तो सबसे पहली बात क्या देखी जाती है? अपनी जाति! अगर गाँव या मोहल्ले में कोई चुनाव हो, तो लोग दबे मुँह सबसे पहले क्या पूछते हैं? “अपने समाज का उम्मीदवार कौन है?” यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर भी लोग अपनी जातियों के नाम से ग्रुप बनाकर ‘शान’ और ‘दबंगई’ के वीडियो पोस्ट करते हैं।

इसे ही कहते हैं ‘आधा सच’। हमारे समाज की सबसे बड़ी बीमारी यह है कि हम जो सच रोज़ सुबह से शाम तक जीते हैं, भरी महफ़िल में उसे कबूल करने से मुकर जाते हैं।


आधुनिकता का नया मुखौटा

हम अक्सर सोचते हैं कि हाथ में महँगा स्मार्टफ़ोन आ जाने से, अंग्रेजी बोल लेने से या शहरों के बड़े-बड़े मॉल में घूम लेने से समाज आधुनिक हो गया है। लेकिन लेखक एन. सिंह हमें एक बहुत कड़वी सच्चाई याद दिलाते हैं: जाति खत्म नहीं हुई है, बस उसने अपने चेहरे पर आधुनिकता का एक नया मुखौटा पहन लिया है।

पहले ज़माने में भेदभाव खुलेआम होता था। आज वही भेदभाव दबी ज़बान में, सिफारिशों में, नौकरियों के साक्षात्कारों में और राजनीतिक टिकटों के बंटवारे में होता है।

हम बच्चों को स्कूल में पढ़ाते हैं कि सब नागरिक बराबर हैं। लेकिन बच्चा जब घर लौटता है, तो अपने बड़ों को जातिगत टिप्पणियां करते देखता है। यह दोहरा रवैया समाज में एक गहरा मानसिक द्वंद्व पैदा करता है। जब किसी समाज में कथनी और करनी के बीच इतनी बड़ी खाई हो जाए, तो वहाँ विश्वास और भाईचारा कभी पनप ही नहीं सकता।


किताब से कड़वा सच

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ की शुरुआत में ही इस पाखंड की धज्जियां उड़ाते हुए लिखते हैं:

“समाज वही छिपाता है, जो उसे सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहाँ सच को पूरा बोलना सबसे बड़ा अपराध है। यहाँ आधा सच सुरक्षित है, पूरा सच खतरनाक। भारत के प्रसंग में हम कहते हैं कि देश बदल रहा है, लेकिन क्या समाज बदल रहा है ? हम कहते हैं कि भारत में जाति खत्म हो रही है, लेकिन क्या सच में खत्म हो रही है ? अगर जाति खत्म हो गई होती, तो नौकरी में उसका जिक्र क्यों होता ? संविधान में अनुच्छेद 15 और 16 की जरूरत क्यों पड़ती ? अगर जाति खत्म हो गई होती, तो चुनाव में उसका गणित क्यों बैठाया जाता ? अगर जाति खत्म हो गई होती तो, शादी में उसका नाम क्यों पूछा जाता ? सच यह है कि ‘जाति’ आज भी जिंदा है- बस उसने अपने चेहरे पर आधुनिकता का मुखौटा पहन लिया है। यह किताब उसी मुखौटे को हटाने की कोशिश है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 11)

लेखक आगे एक मनोवैज्ञानिक तथ्य रखते हैं:

“मनुष्य में अच्छाई को पहचानने की क्षमता है, परन्तु उसे अपनाने का साहस सीमित है। यही सीमित साहस और अधूरा नैतिक विकास, समाज को बार-बार विभाजन की ओर ले जाता है… यदि हम यह स्वीकार कर सकें कि समस्या केवल ‘दूसरों’ में नहीं, बल्कि हम सभी के भीतर है, तो शायद हम एक अधिक ईमानदार संवाद की शुरुआत कर सकें। क्योंकि परिवर्तन का पहला कदम आरोप नहीं, बल्कि आत्मस्वीकृति होता है।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 12-13)


हम इस आधे सच से बाहर कैसे निकलें?

  1. खुद से सच बोलने की हिम्मत: जब तक हम अपनी कमियों पर पर्दा डालते रहेंगे, तब तक कोई कानून या योजना समाज को नहीं बदल सकती। हमें स्वीकार करना होगा कि जातिवादी सोच हमारे अंदर भी कहीं न कहीं बैठी है।
  2. योग्यता और मानवीयता का सम्मान: किसी इंसान का मूल्यांकन उसके जन्म, कुल या सरनेम से नहीं, बल्कि उसके कर्म, मेहनत और ईमानदारी से होना चाहिए।
  3. जातिगत राजनीति का बहिष्कार: जब कोई नेता हमारी जाति का नाम लेकर वोट मांगने आए, तो उससे पूछिए कि उसने हमारे इलाके के बच्चों के भविष्य के लिए क्या किया।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या हम एक ऐसा समाज बना पाएंगे जहाँ किसी नौजवान को अपनी पहचान साबित करने के लिए अपने पुरखों की जाति का सहारा न लेना पड़े?

भारतीय समाज के इस गहरे अंतर्विरोध, इतिहास के सच और जाति की जड़ों की पूरी दास्तान को गहराई से समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का पहला अध्याय हर उस इंसान को पढ़ना चाहिए जो सच को बिना किसी डर के देखना चाहता है।

समाज वही छिपाता है, जो उसे सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहाँ सच को पूरा बोलना सबसे बड़ा अपराध है। यहाँ आधा सच सुरक्षित है, पूरा सच खतरनाक।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

सोचिए • समझिए • सवाल कीजिए

—— लोग | विचार | एक बेहतर समाज की ओर