आरक्षण: बीमारी की दवा या वोटों का पक्का नशा?
एन. सिंह · ·5 मिनट
मान लीजिए किसी दौड़ प्रतियोगिता में एक धावक के पैर में चोट लग गई हो। अब अगर रेस के आयोजक उससे कहें कि “तुम 10 कदम आगे से दौड़ना शुरू करो”, तो यह बिल्कुल न्यायसंगत है। इसे कहते हैं सहारा देना ताकि चोटिल धावक भी दूसरों के साथ बराबरी की दौड़ में शामिल हो सके।
लेकिन अब कल्पना कीजिए कि वह धावक ठीक हो जाए, उसके बच्चे भी जवान हो जाएं, लेकिन वह हर साल यही जिद करे कि “नहीं, मेरे पैर में 70 साल पहले चोट लगी थी, इसलिए मैं और मेरी आने वाली सात पीढ़ियां हमेशा 10 कदम आगे से ही दौड़ेंगी!” और जो बच्चे सचमुच भूखे-प्यासे हैं, उन्हें दौड़ में शामिल ही न होने दिया जाए।
क्या आप इसे न्याय कहेंगे?
आज हमारे देश में आरक्षण का मुद्दा ठीक इसी चौराहे पर खड़ा है। आरक्षण को सामाजिक पिछड़ेपन की बीमारी दूर करने के लिए ‘दवा’ के रूप में लाया गया था। लेकिन आज के राजनेताओं ने इसे अपनी कुर्सी सुरक्षित रखने का ‘स्थायी नशा’ बना दिया है।
78 सालों का कड़वा सच
जब 1950 में भारत का संविधान लागू हुआ था, तो बाबासाहेब अम्बेडकर और संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए राजनीतिक आरक्षण की व्यवस्था केवल 10 वर्षों के लिए की थी। उनकी उम्मीद थी कि 10 वर्षों में सरकार इन वर्गों के बच्चों को ऐसी बेहतरीन शिक्षा, ज़मीन और संसाधन दे देगी कि उन्हें किसी विशेष सहारे की ज़रूरत ही नहीं रहेगी।
लेकिन क्या हुआ?
78 साल बीत गए। हर दस साल बाद सभी राजनीतिक पार्टियां मिलकर बिना किसी बहस के इस मियाद को आगे बढ़ा देती हैं। क्यों? क्योंकि अगर कोई नेता इस पर सवाल उठा दे, तो उसका राजनीतिक करियर खत्म कर दिया जाता है।
आरक्षण का सबसे दुखद पहलू यह है कि जिन जातियों के नाम पर यह व्यवस्था चल रही है, उन जातियों के 90% गरीब लोग आज भी वहीं खड़े हैं जहाँ 1947 में थे। फायदा किसने उठाया? उस 10% हिस्से ने जो एक बार आरक्षण के दम पर बड़ा अफसर, जज, प्रोफेसर या राजनेता बन गया। अब उसी परिवार के बच्चे बड़े-बड़े कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ते हैं, एसी गाड़ियों में घूमते हैं और फिर वही आरक्षण का फॉर्म भरकर गाँव के किसी गरीब चरवाहे या मजदूर के बेटे की सीट छीन लेते हैं!
किताब से कड़वा सच
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ में इस विडंबना पर बिना किसी लाग-लपेट के लिखते हैं:
“आरक्षण ! भारत की सबसे विवादित और शायद सबसे गलत समझी गई नीतियों में से एक है। जो इसके पक्ष में हैं, वे इसे सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा साधन मानते हैं। जो इसके विरोध में हैं, वे इसे योग्यता के खिलाफ़ बताते हैं। यहाँ यह उल्लेख कर देना उचित प्रतीत होता है कि आरक्षण, 1932 के पूना पैक्ट की नींव पर खड़ा होकर अब महल बन चुका है, जिसकी छाया पूरे भारत पर पड़ रही है, चाहे विगत 78 वर्षों से आरक्षण पाने वालों के पास 78 मंजिला इमारत क्यों न हो गई हो; और चाहे उसी वर्ग के लोगों को रोटी भी नसीब न हो—इन दोनों को ही जाति के आधार पर एक ही श्रेणी में रखा जाएगा।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 1393)
वे आगे सवाल उठाते हैं:
“क्या भारत सरकार ने सवर्ण आरक्षण, ओबीसी आरक्षण, एससी-एसटी आरक्षण, महिला आरक्षण, दिव्यांग आरक्षण रूपी नव-निर्मित जातियों का निर्माण नहीं किया है? संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर के 25 नवम्बर, 1949 को विधानसभा के समापन भाषण में भारत के भविष्य के सम्बन्ध में व्यक्त की गई चिंता को पूरा करने के लिए क्या भारत सरकार प्रतिबद्ध है? यदि ऐसा नहीं है, तो राष्ट्र प्रेमियों को ऐसी सरकार की जरूरत नहीं होनी चाहिए।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 797)
बीमारी का असली इलाज क्या है?
- आरक्षण का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे: एक परिवार में आरक्षण का लाभ केवल एक या दो पीढ़ियों तक सीमित होना चाहिए। जो परिवार एक बार आर्थिक रूप से सबल हो गया, उसे स्वेच्छा से या नियमबद्ध तरीके से यह लाभ छोड़ देना चाहिए ताकि उसी की जाति के किसी निर्धन बच्चे का नंबर आ सके।
- समान और मुफ़्त स्कूली शिक्षा: जब तक देश के हर बच्चे को चाहे वह अमीर का हो या गरीब का, एक जैसी उच्चस्तरीय प्राथमिक शिक्षा नहीं मिलेगी, तब तक आरक्षण की बैसाखी कभी नहीं छूट सकती।
- वोट बैंक की राजनीति का अंत: आरक्षण को चुनावी रैलियों में वोट खरीदने का औजार बनाने के बजाय एक निष्पक्ष आयोग के तहत समीक्षा के दायरे में लाया जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या किसी नीति को 78 साल तक बिना उसकी कमियों की जांच किए चलाते रहना देशभक्ति है या राजनीतिक कायरता?
आरक्षण के इस संवेदनशील मुद्दे पर बिना किसी पक्षपात के, संविधान और ज़मीनी हक़ीक़त के आईने में पूरी बहस को समझने के लिए एन. सिंह की किताब ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का छठा अध्याय अवश्य पढ़ें।
आरक्षण, 1932 के पूना पैक्ट की नींव पर खड़ा होकर अब महल बन चुका है, जिसकी छाया पूरे भारत पर पड़ रही है, चाहे विगत 78 वर्षों से आरक्षण पाने वालों के पास 78 मंजिला इमारत क्यों न हो गई हो; और चाहे उसी वर्ग के लोगों को रोटी भी नसीब न हो।