अधूरी जातिगत जनगणना: आँकड़ा नहीं, भ्रम
एन. सिंह · ·1 मिनट
‘गिनती से सत्ता तक’ से एक अंश
अधूरी जातिगत जनगणना आँकड़ा नहीं, भ्रम है। यदि जातिगत जनगणना में केवल यह गिन लिया जाए कि कौन-सी जाति की कितनी संख्या है, तो यह मात्र सांख्यिकीय जानकारी होगी, सामाजिक यथार्थ नहीं।
स्वतंत्रता के लगभग 80 वर्षों में देश की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक परिस्थितियों में व्यापक परिवर्तन हो चुका है; आज का भारत 1947 का भारत नहीं है। इसलिए आय और संपत्ति के समग्र आँकड़ों के बिना सामाजिक न्याय की अवधारणा अधूरी और भ्रामक सिद्ध होगी।
गिनती से आगे क्या चाहिए
समाज की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए प्रत्येक जाति की जनसंख्या के साथ-साथ:
- प्रत्येक व्यक्ति की औसत आय
- ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में घर, भूमि तथा अन्य संपत्तियों का विवरण
- सरकारी एवं निजी क्षेत्रों में वास्तविक भागीदारी
- शिक्षा का स्तर और पेशागत संरचना
- पीढ़ीगत सामाजिक गतिशीलता
यदि ऐसा नहीं किया गया, तो जातिगत जनगणना सामाजिक सुधार का प्रभावी साधन बनने के बजाय सामाजिक संघर्ष का आधार बन सकती है।
अगर भारत को समझना चाहते हैं, तो समाज को भी समझना पड़ेगा और समाज को समझने के लिए… शायद उसे गिनना भी होगा।
अगर भारत को समझना चाहते हैं, तो समाज को भी समझना पड़ेगा।