बाबासाहेब अम्बेडकर, भगत सिंह और सावरकर — तीनों के सपनों का भारत कैसा था?
एन. सिंह · ·5 मिनट
आज जब आप किसी राजनीतिक दल के दफ्तर में जाते हैं, तो एक अजीब नज़ारा दिखता है।
एक पार्टी अपने मंच पर केवल बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की तस्वीर लगाती है। दूसरी पार्टी केवल सरदार पटेल और वीर सावरकर की जय-जयकार करती है। तीसरी पार्टी शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की पगड़ी पहनकर नारे लगाती है।
हर दल ने हमारे देश के महान महापुरुषों को अपनी-अपनी जातियों और राजनीतिक वोट बैंकों के खानों में बांटकर रख दिया है!
लेकिन क्या कभी किसी आठवीं कक्षा के छात्र या नौजवान ने यह जानने की कोशिश की कि इन तीनों महान विभूतियों के दिल में भारत के भविष्य का सपना क्या था? क्या वे सचमुच एक-दूसरे के विरोधी थे, या वे एक ही भारत को तीन अलग-अलग कोणों से एक महान राष्ट्र बनाना चाहते थे?
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ में इन तीनों विचारों का ऐसा निष्पक्ष और गहरा विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं जो हमारी आँखें खोल देता है।
1. डॉ. भीमराव अम्बेडकर का राष्ट्र मॉडल: ‘बंधुत्व’ (Fraternity)
बाबासाहेब अम्बेडकर केवल संविधान के निर्माता नहीं थे, वे एक महान समाजशास्त्री थे।
उन्होंने एक बहुत बड़ी बात कही थी: “स्वतंत्रता और समानता बहुत अच्छी चीज़ें हैं, लेकिन अगर समाज में ‘बंधुत्व’ (आपसी भाईचारा और एक-दूसरे के प्रति अपनापन) नहीं है, तो कानून की किताबें समाज को कभी एक नहीं रख सकतीं!”
बाबासाहेब का मानना था कि भारत तब तक एक सच्चा राष्ट्र नहीं बन सकता जब तक समाज में ऊंच-नीच और जातियों की दीवारें खड़ी हैं। यदि एक सवर्ण और एक दलित कानूनी रूप से समान हैं, लेकिन वे एक-दूसरे के घर में पानी पीने या साथ बैठने से कतराते हैं—तो वह कैसी आज़ादी?
इसलिए अम्बेडकर जी के सपनों का भारत वह था जहाँ जाति व्यवस्था का पूरी तरह विनाश हो और हर नागरिक एक-दूसरे को बराबरी से गले लगाए।
2. शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का राष्ट्र मॉडल: ‘शोषण-मुक्त समाजवाद’
भगत सिंह केवल 23 साल की उम्र में हँसते-हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। उन्होंने जेल से जो लेख लिखे, वे आज भी हर नौजवान के रोंगटे खड़े कर देते हैं।
भगत सिंह ने साफ कहा था: “हमारे लिए आज़ादी का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि गोरे अंग्रेज चले जाएं और उनकी जगह काले अंग्रेज (देशी पूंजीपति और सामंत) आकर बैठ जाएं! हमारे लिए आज़ादी का मतलब है कि मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण हमेशा के लिए खत्म हो!”
भगत सिंह का सपना एक ऐसे भारत का था जहाँ किसान अपनी फसल का मालिक हो, मजदूर को उसकी मेहनत का पूरा फल मिले, और किसी बच्चे को गरीबी के कारण स्कूल छोड़ने पर मजबूर न होना पड़े। वे अंधविश्वास, कट्टरता और सांप्रदायिकता के सबसे बड़े विरोधी थे।
3. वीर सावरकर और पटेल का मॉडल: ‘मजबूत और एकजुट राष्ट्र’
वीर सावरकर और सरदार वल्लभभाई पटेल की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि भारत हज़ारों सालों से बाहरी आक्रमणकारियों से इसलिए हारता रहा क्योंकि यहाँ के लोग बिखरे हुए थे। कोई अपनी जाति में खोया था, कोई अपने छोटे से राज्य में मग्न था।
उनका मानना था कि भारत को एक ऐसा शक्तिशाली सांस्कृतिक और सुरक्षात्मक ढांचा चाहिए जिसे दुनिया की कोई भी ताकत झुका न सके। सरदार पटेल ने 562 रियासतों को एक करके भारत का राजनीतिक नक्शा खींचा। उनका सपना एक ऐसे संगठित और शक्तिशाली भारत का था जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के साथ कोई समझौता न हो।
किताब से कड़वा सच
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के 24वें अध्याय में तीनों विचारों के संगम की आवश्यकता पर बल देते हुए लिखते हैं:
“सबसे बड़े व्यक्तित्व के मालिक डॉ. भीमराव अम्बेडकर, वीर सावरकर और भगत सिंह के राष्ट्र मॉडल को देखें… अम्बेडकर जी ने व्यक्ति के स्वतंत्रता और समानता की बात तो की, लेकिन पूरे संविधान में उन्होंने ‘बंधुत्व’ की बात बड़ी जोर से उठायी। कारण यह था कि कोई सवर्ण समाज और दलित समाज का व्यक्ति स्वतंत्र हो और आर्थिक रूप से समान भी हो, लेकिन आपसी भाईचारा न हो, बिरादरी का स्वीकृतिकरण न हो, तो फिर यह कैसी स्वतंत्रता… अम्बेडकर जी का मानना था कि ‘बंधुत्व के लिए सबसे पहला उपचार जाति व्यवस्था तोड़ने की है, क्योंकि जब तक जाति व्यवस्था समाज में कायम रहेगी, तब तक बंधुत्व आ ही नहीं सकता’।”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 618-619 / 7380)
वे आगे लिखते हैं:
“डॉ. अम्बेडकर को राजनीतिक लाभ के लिए सभी पार्टियाँ इनको ‘आइकॉन’ के रूप में प्रयोग करती चली आ रही हैं, जिसके कारण आज भी भारतीय समाज में जातीय दरार और चौड़ी होती जा रही है… अब का भारत कैसा हो, केवल तीन महान् व्यक्तित्व—डॉ. अम्बेडकर, वीर सावरकर, भगत सिंह के विचारधारा के अनुरूप हो, ताकि राष्ट्र विघटित न हो सके, पर समग्र रूप से परिचर्चा करना है।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 7380 व 7397)
भविष्य के भारत का असली फार्मूला
लेखक एन. सिंह कहते हैं कि आज भारत को किसी एक संकीर्ण वाद की नहीं, बल्कि इन तीनों के सुंदर समन्वय की ज़रूरत है:
- अम्बेडकर का बंधुत्व: हर नागरिक को सामाजिक न्याय, आत्मसम्मान और जाति-विहीन समता मिले।
- भगत सिंह का समाजवाद: किसान, जवान और मजदूर को कॉरपोरेट लूट से मुक्ति मिले और शिक्षा-स्वास्थ्य पर सबका समान हक हो।
- पटेल-सावरकर की राष्ट्रीय दृढ़ता: देश की सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा के प्रति अटूट निष्ठा और मजबूत प्रशासनिक अनुशासन हो।
जब यह त्रिवेणी मिलेगी, तभी भारत 21वीं सदी का सच्चा विश्वगुरु और महाशक्ति बन सकेगा।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या हम महापुरुषों को अपनी संकीर्ण जातियों के झंडों में कैद रखेंगे, या उनके समग्र दर्शन को समझकर भारत को अखंड और महान बनाएंगे?
अम्बेडकर, भगत सिंह, सुभाष, पटेल और सावरकर के विचारों की इस ऐतिहासिक तुलना और भविष्य के राष्ट्र मॉडल को समझने के लिए विमला सिंह और एन. सिंह की पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का 24वां अध्याय ज़रूर पढ़ें।
अम्बेडकर जी का मानना था कि ‘बंधुत्व के लिए सबसे पहला उपचार जाति व्यवस्था तोड़ने की है, क्योंकि जब तक जाति व्यवस्था समाज में कायम रहेगी, तब तक बंधुत्व आ ही नहीं सकता’... अब का भारत कैसा हो, केवल तीन महान् व्यक्तित्व—डॉ. अम्बेडकर, वीर सावरकर, भगत सिंह के विचार पर समग्र मंथन करना होगा।