'क्रीमी लेयर' और ड्रैगन के दाँत — जब अपने ही अमीर भाई गरीबों का हक दबा लें
एन. सिंह · ·5 मिनट
आपने रसोई में दूध उबलते देखा होगा। जब दूध ठंडा होता है, तो उसके ऊपर एक मोटी मलाई (क्रीम) जम जाती है। अगर आप उस मलाई को चम्मच से अलग न करें, तो नीचे का पतला दूध किसी को दिखाई ही नहीं देता।
समाज में भी ठीक यही होता है। इसी को अंग्रेजी में ‘क्रीमी लेयर’ (मलाईदार परत) कहा जाता है।
अब ज़रा सोचिए: एक आरक्षित वर्ग में एक व्यक्ति आरक्षण की मदद से बड़ा अधिकारी बन गया, उसके पास करोड़ों का बंगला है, शहर में कई गाड़ियां हैं और उसके बच्चे विदेश के विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ उसी की जाति का एक गरीब मजदूर है, जो गाँव में पसीना बहाकर अपने बच्चे की 200 रुपये की स्कूल फीस भी नहीं भर पा रहा है।
क्या इन दोनों परिवारों की हैसियत, ताकत और ज़रूरत बराबर है?
जब सरकारी नौकरी की परीक्षा होती है, तो उस बड़े अधिकारी का बेटा भी उसी कोटे में फॉर्म भरता है और उस मजदूर का बेटा भी। नतीजा क्या होता है? बड़े अफसर का बेटा महँगी कोचिंग के दम पर वह सीट ले जाता है और गरीब का बच्चा फिर से वहीं खेत में मजदूरी करने लौट जाता है।
ड्रैगन के मुँह में दाँत रोपने जैसी विडंबना
जब भी सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) या कोई निष्पक्ष आयोग यह कहता है कि आरक्षण का लाभ पाने वालों में से जो लोग अमीर और ताकतवर बन चुके हैं (क्रीमी लेयर), उन्हें इस व्यवस्था से बाहर किया जाए ताकि असली गरीबों को मौका मिले—तो सबसे पहले कौन चिल्लाता है?
सवर्ण समाज नहीं चिल्लाता! सबसे पहले उन्हीं आरक्षित वर्गों के बड़े-बड़े नेता, सांसद और अफसर चिल्लाने लगते हैं कि “हमारा हक छीना जा रहा है!”
लेखक एन. सिंह ने इसके लिए एक बहुत तीखी और सटीक उपमा दी है: “ड्रेगन के मुँह में दाँत रोपना।”
कथाओं में ड्रैगन एक ऐसा विशाल और खूंखार जीव माना जाता है जिसके जबड़े को कोई आसानी से नहीं खोल सकता। यदि कोई सोचे कि वह उस ड्रैगन के मुँह में नए दाँत रोप देगा या उसकी नाक में नकेल डालकर उसे सीधा चला लेगा, तो यह उसका वहम है। ठीक उसी तरह, जिन लोगों ने आरक्षण के सहारे दशकों से ताकत, सत्ता और पैसे पर कब्ज़ा जमा लिया है, वे कभी भी अपनी मलाई स्वेच्छा से नहीं छोड़ेंगे। वे अपने ही गरीब भाइयों के नाम पर आंसू बहाते हैं, लेकिन असली फायदा खुद डकार जाते हैं।
किताब से कड़वा सच
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के 15वें अध्याय में इस व्यवस्था का कच्चा-चिट्ठा खोलते हुए लिखते हैं:
“हाँ, भारतीय समाज ने दलित वर्ग को अवश्य पीछे किया, क्योंकि वह बहिष्कृत जाति थी। उन्हें शिक्षा से भी रोका गया था और उन्हें आरक्षण की भी आवश्यकता थी। लेकिन देश की आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी आरक्षण का लाभ पाने वाला एससी-एसटी समाज महज़ इसलिए पूरी तरह आगे नहीं आ पाया है, क्योंकि उनके ही कुछ भाइयों ने आरक्षण के अंतर्गत उन्हें दी गई अधिकांश सीटों पर कब्ज़ा कर लिया है और वे लोग दलित से उबरकर अब फलित हो गए हैं; लेकिन अपने गरीब भाइयों के लिए सीटें खाली नहीं कर रहे हैं, न ही सरकार इसमें हस्तक्षेप कर रही है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 797)
वे आगे लिखते हैं:
“यहीं से यह आलोचना जन्म लेती है कि वर्तमान क्रीमी लेयर व्यवस्था एक प्रकार से “ढोल का पोल” बन गई है—दिखने में मजबूत, पर वास्तविक दबाव में खोखली। इसे समझाने के लिए एक तीखी उपमा दी जाती है: जैसे कोई व्यक्ति यह कल्पना करे कि वह ड्रेगन के मुँह में दाँत रोप देगा और उसे काबू में कर लेगा। वास्तविकता यह है कि न तो ड्रेगन के मुँह में नए दाँत रोपे जा सकते हैं, और न ही उसकी नाक में नथ डालकर उसे चलाया जा सकता है।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 3575)
क्या है असली समाधान?
- सख्त आर्थिक और सामाजिक पैमाना: क्रीमी लेयर की सीमा केवल कागजी आय प्रमाण पत्र (जो 500 रुपये की घूस देकर बन जाता है) पर तय न हो, बल्कि आयकर रिटर्न, संपत्ति और पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर तय की जाए।
- उप-वर्गीकरण (Sub-categorization): आरक्षित श्रेणियों के भीतर जो जातियां आज तक एक भी सरकारी नौकरी में नहीं पहुँच पाई हैं, उनके लिए अलग से विशेष कोटा तय किया जाए ताकि दबंग उपजातियां सारा हिस्सा न हड़प सकें।
- कमजोर वर्ग की एकजुटता: गाँव के गरीब दलित और पिछड़े समाज को यह समझना होगा कि उनका असली शोषण अब कोई दूर का सवर्ण नहीं, बल्कि उनकी ही जाति का वह अमीर मलाईदार नेता कर रहा है जो उनकी झोपड़ी की तस्वीर दिखाकर दिल्ली में मंत्री बना बैठा है।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या सामाजिक न्याय का मतलब सिर्फ कुछ खास परिवारों का अरबपति बनना है या समाज के सबसे निचले व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाना?
क्रीमी लेयर के इस पूरे कानूनी विवाद, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों और नेताओं के दोगलेपन की पूरी दास्तान जानने के लिए एन. सिंह की किताब ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का 15वां अध्याय ज़रूर पढ़ें।
वर्तमान क्रीमी लेयर व्यवस्था एक प्रकार से 'ढोल का पोल' बन गई है—दिखने में मजबूत, पर वास्तविक दबाव में खोखली। जैसे कोई व्यक्ति यह कल्पना करे कि वह ड्रेगन के मुँह में दाँत रोप देगा और उसे काबू में कर लेगा।