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10 रुपये की दवा 100 रुपये में क्यों? बीमारी पर धंधा और आम आदमी की बेबसी

एन. सिंह · ·4 मिनट

किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार में सबसे डरावना दिन कौन सा होता है?

वह दिन नहीं जब घर में राशन कम हो जाए, बल्कि वह दिन जब घर का कोई बुज़ुर्ग या बच्चा गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए!

बीमारी आते ही पूरे परिवार के पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है। जब वे सरकारी ज़िला अस्पताल पहुँचते हैं, तो वहाँ की तस्वीर क्या होती है? बदबूदार शौचालय, टूटे हुए पंखे, स्ट्रेचर के लिए लाचारी और ओपीडी के बाहर सैकड़ों मरीज़ों की चीख-पुकार। डॉक्टर साहब दो मिनट में मरीज़ को देखते हैं और एक कागज़ पर तीन दवाइयां और चार जांचें लिख देते हैं।

जब वह गरीब अस्पताल के सरकारी दवा काउंटर पर जाता है, तो कर्मचारी खिड़की से हाथ हिलाकर कह देता है—“ये दवाइयां यहाँ नहीं हैं, बाहर सामने वाली दुकान से ले आओ!”

और जब वह बाहर मेडिकल स्टोर पर पहुँचता है, तो दुकानदार 15 गोलियों के एक पत्ते का दाम बताता है: ₹450!

उस गरीब मजदूर की तीन दिन की दिहाड़ी सिर्फ एक गोली के पत्ते में उड़ जाती है। क्या आपने कभी सोचा है कि जिस गोली को बनाने में केवल 2 से 5 रुपये का खर्च आता है, उस पर 450 रुपये की एमआरपी (MRP) क्यों छपी होती है?


मेडिकल माफिया और कमिशन का खूनी खेल

यह कोई संयोग नहीं है, यह एक बहुत बड़ा संगठित व्यापार है।

  1. ब्रांडेड बनाम जेनेरिक का खेल: विज्ञान और केमिस्ट्री का नियम है कि दवा का असली काम उसका ‘सॉल्ट’ (मूल घटक) करता है, कंपनी का नाम नहीं। पैरासिटामोल चाहे 2 रुपये की मिले या 50 रुपये की, बुखार उतारने का काम एक ही सॉल्ट करता है। लेकिन दवा कंपनियां अपने ब्रांड का प्रचार करके डॉक्टरों को महंगे उपहार, विदेश यात्राएं और भारी कमिशन देती हैं।
  2. कागजी अस्पतालों की चकाचौंध: लेखक बताते हैं कि जो देश अपने पुराने ज़िला अस्पतालों के पेशाबघरों की सफाई नहीं करवा सकता, जहाँ जीवन रक्षक दवाएं उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ सरकारें सिर्फ चुनाव जीतने के लिए नए-नए मेडिकल कॉलेजों और एम्स की घोषणाएं करती हैं। इमारतें खड़ी हो जाती हैं, लेकिन डॉक्टर और दवाएं नदारद रहती हैं।
  3. आम आदमी की पाई-पाई की लूट: आज भारत में लाखों परिवार हर साल सिर्फ इसलिए गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं क्योंकि उनके घर में किसी सदस्य का इलाज कराना पड़ा। बीमारी ने देश की आधी जनता को कर्ज़दार बनाकर रख दिया है।

किताब से कड़वा सच

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के दूसरे और 16वें अध्याय में स्वास्थ्य व्यवस्था की इस संवेदनहीनता पर करारी चोट करते हुए लिखते हैं:

“पूछने की हिमाकत नहीं कर पाता कि आखिरकार लागत मूल्यों का चौगुना दाम इन दवाओं पर क्यों लिखा जा रहा है। यह बात केवल अंग्रेजी काल में ही पूछी जाती थी, जिसको हम यह कहते थे कि भारत ‘सोने की चिड़िया’ थी, उसे लूटकर अंग्रेज़ और मुगल ले गये… आज भी भारत लूटा जा रहा है। इसको अंग्रेज़ नहीं, बल्कि यहाँ के लोग दुरभिसंधि करके लूटकर अपना घर भर रहे हैं, तो उस डाकू और इस डाकू में क्या अंतर है। गरीब जनता तो पीसी ही जा रही है।”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 4397)

सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की सच्चाई पर वे आगे लिखते हैं:

“सरकारी अस्पतालों में तो इन्हें घूमने-टहलने की पूरी छूट मिली रहती है। छोटे-छोटे जिलों में, जहाँ मेडिकल कॉलेज हैं, वहाँ वोट के लिए ‘एम्स’ भी खोले जा रहे हैं। जो देश जिला अस्पताल नहीं चला सकता था, वह मेडिकल कॉलेज चलाने की तैयारी में है। पुराने अस्पतालों के पेशाबघरों, फाटकविहीन संडासों में सफाई का भी पैसा नहीं है… विदेशी लाइटें लाकर फिल्मीस्तान जैसा चकाचौंध उत्पन्न कर देने से भारत का विकास नहीं हो जाता।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 6234)


असली सुधार का रास्ता

  1. दवाओं की कीमतों पर सख्त सरकारी नियंत्रण (Price Capping): सरकार को जीवन रक्षक और सामान्य दवाओं के उत्पादन खर्च (Cost of Production) के आधार पर अधिकतम मूल्य तय करना चाहिए। मुनाफा 20-30% से अधिक रखने की अनुमति किसी भी कंपनी को न मिले।
  2. सॉल्ट नाम से प्रिस्क्रिप्शन अनिवार्य: डॉक्टर पर्चे पर किसी कंपनी का ब्रांड नाम न लिखें, बल्कि दवा का रासायनिक नाम (Generic Name) लिखें ताकि मरीज़ किसी भी दुकान से सबसे सस्ती दवा खरीद सके।
  3. ज़िला अस्पतालों का कायाकल्प: नए मेडिकल कॉलेजों की घोषणाओं से पहले मौजूदा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और ज़िला अस्पतालों में डॉक्टरों की 24 घंटे मौजूदगी और सभी जरूरी दवाओं का 100% मुफ्त वितरण सुनिश्चित किया जाए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या स्वास्थ्य एक मौलिक मानवीय अधिकार है, या यह इंसान की सांसों पर चलने वाला सबसे निर्दयी धंधा बन चुका है?

स्वास्थ्य तंत्र के माफिया, दवा कंपनियों की लूट और भारत के आम नागरिक की बेबसी का पूरा कच्चा-चिट्ठा समझने के लिए विमला सिंह और एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का दूसरा और 16वां अध्याय अवश्य पढ़ें।

पूछने की हिमाकत नहीं कर पाता कि आखिरकार लागत मूल्यों का चौगुना दाम इन दवाओं पर क्यों लिखा जा रहा है... आज भी भारत लूटा जा रहा है। इसको अंग्रेज़ नहीं, बल्कि यहाँ के लोग दुरभिसंधि करके लूटकर अपना घर भर रहे हैं।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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