देश और राष्ट्र में क्या अंतर है? 'होटल' बनाम 'अपना घर' की सीख
एन. सिंह · ·5 मिनट
अगर किसी आठवीं के बच्चे से पूछा जाए कि—“देश (Country) और राष्ट्र (Nation) में क्या फर्क है?” तो शायद वह थोड़ी देर सोचेगा और कहेगा—“दोनों का मतलब तो एक ही होता है!”
लेकिन वास्तव में दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है।
इस अंतर को समझने के लिए लेखक एन. सिंह एक ऐसा उदाहरण देते हैं जिसे कोई भी कभी नहीं भूल सकता: होटल बनाम अपना घर!
ज़रा सोचिए, जब आप किसी होटल में कमरा किराए पर लेते हैं, तो आप क्या करते हैं?
- आप पंखा, एसी, टीवी सब चालू छोड़ देते हैं।
- पानी का नल खुला रह जाए तो आपको कोई फर्क नहीं पड़ता।
- अगर होटल के सोफे पर कोई खरोंच आ जाए या दीवार गंदी हो जाए, तो आप कहते हैं—“मुझे क्या? मैंने तो पैसे दिए हैं, होटल वाला जाने!” होटल केवल कुछ दिनों तक सुख-सुविधाएं भोगने की जगह है, उससे आपका कोई आत्मिक लगाव नहीं होता।
लेकिन अब ज़रा अपने घर के बारे में सोचिए।
- अगर आपके घर की छत से एक बूंद पानी भी टपकता है, तो पूरा परिवार चिंता में पड़ जाता है।
- अगर कोई आपके घर पर बुरी नज़र डाले या दीवार तोड़ने की कोशिश करे, तो आप अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी अपने घर को बचाते हैं।
‘देश’ एक होटल की तरह हो सकता है, लेकिन ‘राष्ट्र’ हमारे अपने घर जैसा होता है!
क्या हम भारत को होटल समझ रहे हैं?
आज हमारे समाज की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि ज़्यादातर पढ़े-लिखे और अमीर लोग भारत को केवल एक ‘होटल’ समझकर जी रहे हैं।
वे सोचते हैं:
- देश से जो भी सुख-सुविधा, सब्सिडी या लाभ मिल सकता है, लूट लो!
- टैक्स देने की बारी आए, तो सीए (CA) लगाकर कागज़ों में हेराफेरी कर लो!
- सड़क पर कचरा फेंक दो, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचा दो—क्योंकि यह तो ‘सरकारी’ है!
- और जब सीमा पर देश की रक्षा करने की बात आए, तो वे सोचते हैं—“अरे, सीमा पर मरने के लिए 35 हज़ार रुपये की तनख्वाह पाने वाला गरीब किसान का लड़का तो है ही, हम क्यों जाएं? हम तो फाइव-स्टार होटल में बैठकर देशभक्ति के नारे लगाएंगे!”
जब किसी देश के नागरिकों के मन में ऐसी संकीर्ण और स्वार्थी सोच घर कर जाती है, तो वह समाज भीतर से खोखला हो जाता है।
संविधान और राष्ट्र की आत्मा
संविधान के अनुच्छेद 1 में लिखा है: “India, that is Bharat, shall be a Union of States” (भारत राज्यों का एक संघ होगा)। पश्चिमी विचारक इसे केवल एक कानूनी समझौता मानते हैं।
लेकिन हमारे वैदिक ऋषियों, छत्रपति शिवाजी महाराज, सरदार वल्लभभाई पटेल और बाबासाहेब अम्बेडकर के लिए भारत केवल राज्यों का जोड़ नहीं था। भारत एक जीवित सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना है। एक ऐसा घर जहाँ कश्मीर से कन्याकुमारी तक रहने वाले हर नागरिक के सुख-दुख एक हैं।
यदि हम केवल अपने स्वार्थ, अपनी जाति और अपने क्षेत्र की बात करेंगे, तो भारत सिर्फ एक ‘अस्वाभाविक देश’ बनकर रह जाएगा। लेकिन जब हम जाति और भाषा से ऊपर उठकर एक-दूसरे के प्रति ‘बंधुत्व’ (भाईचारे) का भाव रखेंगे, तब भारत एक अजेय ‘राष्ट्र’ बनेगा।
किताब से कड़वा सच
लेखक एन. सिंह अपनी युगांतरकारी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के 24वें अध्याय में इस अंतर को मार्मिक शब्दों में उकेरते हैं:
“देश का स्वरूप एक ‘होटल’ जैसा होता है, जहाँ यात्री रुकते हैं, होटल की सुख-सुविधाओं का लाभ लेते हैं, होटल की हिफाजत की जिम्मेदारी यात्रियों पर नहीं होती है। यात्री, होटल को सुख-सुविधा का साधन मानते हैं, जबकि राष्ट्र अपने घर जैसा होता है, जिसके हिफाजत की जिम्मेदारी मकान मालिक और उसमें रहने वाले परिवार के लोगों की होती है। वह घर सुख साधन का स्थान नहीं, बल्कि नैतिक, चारित्रिक, सामाजिक पवित्रता का स्थान होता है और उस घर में रहनेवाला प्रत्येक व्यक्ति उसकी रक्षा अपने प्राणों की कीमत पर करता है, लेकिन आज वर्तमान भारत के अधिकांश लोग भारत को राष्ट्र नहीं, बल्कि देश समझते हैं और इसके द्वारा प्रदत्त सुख-सुविधाओं का केवल लाभ उठाते हैं…”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 616 / 7357)
वे आगे चेतावनी देते हैं:
“क्योंकि यह सोचते हैं कि रक्षा तो इनके टुकड़े पर पलने वाला 35000 रुपये प्रतिमाह तनख्वाह पाने वाला एक गरीब का लड़का, जिसको ये लोग अपना नौकर समझ रखे हैं, इनके लिए सीमा पर तो जग ही रहा होगा… नैतिकता का लोप हो चुका है, भौतिकता भयंकर रूप से इन पर हावी है, सेना के प्रति इनका कोई सम्मान नहीं रह गया है, केवल नारे लगा देना और उनकी शहादत पर कुछ अफ़सोस के शब्द ऊपरी मन से बक देना इनकी आदत में शुमार हो गया है।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 7363)
असली राष्ट्र निर्माण की राह
- उपभोक्ता नहीं, रक्षक बनिए: सरकारी सुविधाओं को केवल अपने फायदे के लिए नोचने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी। जो देश हमें पहचान, सुरक्षा और आज़ादी देता है, उसके प्रति हमारा पहला कर्तव्य अनुशासन और ईमानदारी है।
- जाति-धर्म से ऊपर उठकर बंधुत्व: जब तक हम एक-दूसरे को हिंदू, मुस्लिम, अगड़ा या पिछड़ा देखने के बजाय भारत माता की एक ही संतान नहीं मानेंगे, तब तक घर मजबूत नहीं हो सकता।
- सैनिकों और श्रम का सच्चा सम्मान: समाज के सबसे बड़े नायक वे होने चाहिए जो पसीना बहाकर अनाज उगाते हैं और जो सरहद पर खून बहाते हैं—न कि वे जो टैक्स चुराकर मौज उड़ाते हैं।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या आप भारत को केवल एक होटल मानकर उसकी सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं, या इसे अपना पवित्र घर मानकर इसकी मर्यादा के लिए खड़े होने को तैयार हैं?
राष्ट्रवाद की इस सच्ची, पवित्र और झकझोर देने वाली व्याख्या को समझने के लिए एन. सिंह की अमर कृति ‘अनोखा भारत: भारत का अवसरवादी लोकतंत्र, विनाशकारी घटकों का उदय’ का तीसरा और 24वां अध्याय ज़रूर पढ़ें।
देश का स्वरूप एक ‘होटल’ जैसा होता है, जहाँ यात्री रुकते हैं, होटल की सुख-सुविधाओं का लाभ लेते हैं, होटल की हिफाजत की जिम्मेदारी यात्रियों पर नहीं होती... जबकि राष्ट्र अपने घर जैसा होता है, जिसके हिफाजत की जिम्मेदारी मकान मालिक और उसमें रहने वाले परिवार के लोगों की होती है।