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गणना से समृद्धि तक — भारत को सचमुच महाशक्ति बनाने का रास्ता क्या है?

एन. सिंह · ·5 मिनट

मान लीजिए किसी गाँव में एक किसान बहुत दुबला-पतला और बीमार है।

अब गाँव का डॉक्टर रोज़ सुबह उसके घर आए, थर्मामीटर से उसका बुखार नापे, उसका वजन तोले, उसकी नब्ज़ गिने, और एक रजिस्टर में लिख ले—“वजन: 42 किलो, बुखार: 101 डिग्री!”

शाम को डॉक्टर फिर आए, फिर से वही नाप-तौल करे और रजिस्टर में लिख ले।

लेकिन वह डॉक्टर न उस किसान को एक गोली दवा दे, न पीने के लिए दूध का इंतज़ाम करे, और न ही उसे पौष्टिक भोजन दे! अब आप बताइए: क्या एक साल तक रोज़ सुबह-शाम नाप-तौल और गिनती करते रहने से उस किसान की बीमारी ठीक होगी? क्या वह कभी तंदुरुस्त और पहलवान बन पाएगा?

कदापि नहीं!

आज भारत के हालात ठीक वैसे ही हैं। 21वीं सदी में जब दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष अनुसंधान और नए उद्योगों की बात कर रही है—हमारे देश के राजनीतिक दल 24 घंटे केवल एक ही बात पर बहस कर रहे हैं: जातियों की गिनती!


21वीं सदी की दुनिया और हमारी उलझन

ज़रा दुनिया के बाकी देशों पर नज़र डालिए:

  • अमेरिका और यूरोप: दुनिया की सबसे उन्नत तकनीक और वैज्ञानिक पेटेंट्स बना रहे हैं।
  • चीन: दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बन चुका है। हमारे हाथ का स्मार्टफोन, टीवी, खिलौने और यहाँ तक कि दिवाली की झालरें तक चीन से बनकर आ रही हैं।
  • ताइवान: एक छोटा सा द्वीप पूरी दुनिया के 70% कंप्यूटर चिप्स (सेमीकंडक्टर) बना रहा है।

और हम कहाँ खड़े हैं?

हम आज भी इस बात पर झगड़ रहे हैं कि 1931 की जनगणना के हिसाब से किसकी आबादी कितनी है, किस जाति को किस कोटे में डाला जाए, और कौन सा नेता किस बिरादरी का है!

लेखक एन. सिंह बहुत साफ शब्दों में कहते हैं: केवल सिर गिन लेने से किसी के घर में समृद्धि (Prosperity) नहीं आ सकती। गिनती तो केवल यह जानने का साधन है कि कहाँ कमी है; असली काम तो उस कमी को दूर करने के लिए ठोस नीतियां बनाना और पसीना बहाना है!


किताब से कड़वा सच

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के 16वें अध्याय में भारत के भविष्य का खाका खींचते हुए लिखते हैं:

“यदि जातीय जनगणना का उद्देश्य सत्ता प्राप्ति का साधन न होकर सामाजिक उत्थान एवं सामाजिक एकता के साथ-साथ सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने का है, तो निश्चित ही देश एवं देशवासियों का भला होगा। लेखक आरक्षण का समर्थन करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि इसका लाभ समाज के सभी पात्र एवं वंचित लोगों तक पहुँचना चाहिए, न कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी केवल कुछ परिवारों या विशेष समूहों को ही मिलता रहे। इसी संदर्भ में देश को अपने अतीत की सच्चाइयों और भविष्य की संभावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 163-165 व अध्याय 16)

वे आगे राष्ट्र के उत्थान की शर्त रखते हैं:

“समस्याओं से मुँह मोड़कर कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता। केवल नारे लगा देने से या 5 किलो मुफ्त अनाज बांट देने से विकसित भारत का सपना पूरा नहीं होगा। भारत को यदि सचमुच विश्वगुरु बनना है, तो उसे अपनी उत्पादन क्षमता, वैज्ञानिक सोच और शिक्षा के स्तर में अमेरिका और चीन से आगे निकलना होगा। जब तक गाँव का नौजवान आत्मनिर्भर नहीं होगा, तब तक हर घोषणा खोखली रहेगी।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 839 व 7357)


‘गणना से समृद्धि’ का 4-सूत्रीय राष्ट्रीय रोडमैप

यदि हम सचमुच भारत को एक महान और समृद्ध राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो हमें इन चार बुनियादी स्तंभों पर काम करना होगा:

1. प्राथमिक शिक्षा में संपूर्ण समानता

जब तक देश के हर बच्चे को (चाहे वह अमीर का हो या गरीब का, किसी भी जाति का हो) सरकारी स्तर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर की मुफ्त, आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा नहीं मिलेगी, तब तक सामाजिक न्याय अधूरा रहेगा। एन. सिंह का सुझाव है कि सभी सरकारी योजनाओं का लाभ सरकारी प्राइमरी स्कूल के बच्चों से जोड़ा जाए।

2. कृषि का औद्योगिकीकरण और किसान की सुरक्षा

भारत की 60% आबादी कृषि से जुड़ी है। जब तक किसान की फसल का उचित मूल्य नहीं मिलेगा और गाँव-गाँव में एग्रो-प्रोसेसिंग यूनिट्स नहीं लगेंगी, तब तक गाँव का विकास नहीं हो सकता। किसान का कर्ज़ में मरना देश के माथे पर कलंक है।

3. युवाओं को हुनर और रोज़गार (Skill & Production)

कोरी डिग्रियां बांटने वाले कॉलेजों की जगह तकनीकी, व्यावसायिक और उत्पादन आधारित शिक्षा दी जाए। भारत को सिर्फ ‘सेवा प्रदाता’ (Service Provider) नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक (Manufacturer) बनना होगा।

4. जातियों की संकीर्णता से मुक्ति और राष्ट्रीय एकता

जाति हमारे इतिहास की सच्चाई हो सकती है, लेकिन वह हमारे भविष्य की सीमा नहीं बननी चाहिए। हमें ‘होटल’ वाली मानसिकता छोड़कर भारत को अपना ‘पवित्र घर’ मानना होगा, जहाँ हर नागरिक एक-दूसरे के सुख-दुख में साझीदार हो।


एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या हम अगले 50 सालों तक सिर्फ अपने पूर्वजों की जातियों के नाम पर लड़ते रहेंगे, या अपने बच्चों के हाथों में विज्ञान, हुनर और समृद्धि का परचम थमाएंगे?

जाति, राजनीति, आरक्षण और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की इस पूरी गाथा को समझने और एक नए, सशक्त भारत की कल्पना को साकार करने के लिए लेखक एन. सिंह की दोनों ऐतिहासिक पुस्तकें:

  1. ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’
  2. ‘अनोखा भारत: भारत का अवसरवादी लोकतंत्र, विनाशकारी घटकों का उदय’

को आज ही अपनी लाइब्रेरी का हिस्सा बनाएं और पूरा पढ़ें। यह केवल किताबें नहीं, बल्कि भारत की सोई हुई चेतना को जगाने वाला शंखनाद हैं।

यदि जातीय जनगणना का उद्देश्य सत्ता प्राप्ति का साधन न होकर सामाजिक उत्थान एवं सामाजिक एकता के साथ-साथ सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने का है, तो निश्चित ही देश एवं देशवासियों का भला होगा... देश को अपने अतीत की सच्चाइयों और भविष्य की संभावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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