इतिहास के नाम पर नफ़रत की खेती — औरंगज़ेब, मंदिर और आज के खोखले भाषण
एन. सिंह · ·5 मिनट
कल्पना कीजिए कि आप एक कार में बैठे हैं और आगे बढ़ रहे हैं।
यदि कार का ड्राइवर सामने की सड़क को देखने के बजाय अपनी पूरी नज़र केवल पीछे देखने वाले शीशे (Rear-view Mirror) पर टिकाए रखे, तो क्या होगा? कुछ ही सेकंड में गाड़ी किसी पेड़ या खाई से टकरा जाएगी और चकनाचूर हो जाएगी!
पीछे देखना सिर्फ यह जानने के लिए ज़रूरी है कि पीछे क्या था; लेकिन गाड़ी हमेशा सामने देखकर ही आगे बढ़ती है।
आज हमारे देश की राजनीति में ठीक यही उल्टी गंगा बहाई जा रही है।
- जब कोई नौजवान पूछता है कि—“साहब, भर्ती की परीक्षा कब होगी और रिजल्ट कब आएगा?”
- जब कोई किसान पूछता है कि—“साहब, खाद की बोरी पर सब्सिडी कब मिलेगी?”
- जब कोई बीमार बुजुर्ग पूछता है कि—“अस्पताल में डॉक्टर कब बैठेंगे?”
तो मंच पर खड़े नेताजी माइक पर चीखने लगते हैं—“भाइयों और बहनों! 400 साल पहले औरंगज़ेब ने मंदिर तोड़ा था! 500 साल पहले बाबर ने हमला किया था! हमें उस इतिहास का बदला लेना है!”
अब आप बताइए: क्या 400 साल पुराने इतिहास को खोदने से आज के बेरोजगार नौजवान को नौकरी मिल जाएगी? क्या किसी बीमार का इलाज मुगलों के नाम पर भाषण देने से हो जाएगा?
चुनावी गणित और फर्जी आंकड़े
लेखक एन. सिंह इतिहास के इस राजनीतिक दुरुपयोग पर एक बहुत ही रोचक और आँखें खोल देने वाला गणितीय विश्लेषण पेश करते हैं।
भाषणों और सोशल मीडिया के व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स में यह दावा किया जाता है कि मुगल बादशाह औरंगज़ेब रोज़ 10,000 ब्राह्मणों का कत्ल करता था और उनका जनेऊ तौलता था।
लेखक पूछते हैं कि क्या किसी ने कभी इसका गणित लगाया है? औरंगज़ेब ने कुल 51 साल शासन किया (1658 से 1707 तक)। 51 साल में लगभग 18,600 दिन होते हैं। यदि वह रोज़ 10,000 लोगों को मारता, तो उसने अपने पूरे शासनकाल में 18 करोड़ से ज़्यादा लोगों का कत्ल कर दिया होता!
जबकि उस समय पूरे भारत की कुल आबादी ही 10-12 करोड़ के आस-पास थी और ब्राह्मणों की आबादी लगभग 1 से 2 करोड़ थी!
तो क्या औरंगज़ेब ने जितनी आबादी थी उससे दस गुना ज़्यादा लोगों को मार दिया?
लेखक कहते हैं कि इस तरह के बेतुके और झूठे आंकड़े सिर्फ इसलिए गढ़े जाते हैं ताकि आज के भोले-भाले नौजवानों के दिलों में दूसरे समुदायों के प्रति ज़हर भरा जा सके।
दिन में नफ़रत का भाषण, रात में शादी में हंसी-ठिठोली!
सबसे बड़ा पाखंड तो यह है कि जो नेता दिन में टीवी पर एक-दूसरे को ‘देशद्रोही’, ‘आतंकवादी’ और ‘कट्टरपंथी’ कहकर गालियां देते हैं—शाम को जब किसी बड़े उद्योगपति या वीआईपी की शादी होती है, तो वही सारे नेता एक ही सोफे पर बैठकर काजू-बादाम खाते हैं और एक-दूसरे के गले में हाथ डालकर ठहाके लगाते हैं!
वे कान में फुसफुसाते हैं—“अरे भाई, वो तो दिन में भाषण देना पड़ता है, जनता को बेवकूफ बनाए बिना वोट कहाँ से मिलेगा!”
मरता कौन है?
मरता है आम जनता का वह निर्दोष लड़का, जो भाषण सुनकर दूसरे मोहल्ले के लड़के पर पत्थर फेंक देता है। उसके खिलाफ पुलिस मुकदमा दर्ज कर लेती है, उसकी पूरी ज़िंदगी जेल और अदालतों के चक्कर में बर्बाद हो जाती है। नेताजी का बेटा तो लंदन में पढ़ाई कर रहा होता है, और गरीब का बेटा दंगे का आरोपी बनकर जेल में सड़ता है!
किताब से कड़वा सच
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के 24वें अध्याय में इस खोखली राजनीति की धज्जियां उड़ाते हुए लिखते हैं:
“सभी महान् चुने हुए जन-प्रतिनिधि, जो महान् गणितज्ञ रामानुजन से गणितीय प्रतिभा में कम नहीं बैठते हैं, अपनी-अपनी जातियों/धर्मों का हिसाब, जो विगत 35 वर्षों में घटनाएँ घट चुकी हैं, सत्ता पाने के लिए गणित बिठाने के लिए लगे रहते हैं और अपने लच्छेदार भाषणों में यह बताते हैं कि अतीत में किसने किसको मारा, कौन किसको सताया… इन प्रतिनिधियों के बीच शासन सत्ता के लिए आपसी ईर्ष्या अंदर से जारी है और वाणी से ये लोग जनता को गुमराह कर देते हैं, लेकिन ये नेता अपने आपसी शारीरिक चोट से हमेशा बचे रहते हैं और आपस में बैठकर हँसी-मजाक वैवाहिक कार्यक्रमों में आना-जाना जारी रहता है और कान में एक-दूसरे से कहते हैं कि यह तो राजनीति की बात है भाई।”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 7353)
वे आगे लिखते हैं:
“जबकि इनके व्यथित करने वाले शब्द-बाण, सामान्य जनता के हृदय को भेद रहे हैं और जनता में विद्रोष बढ़ रहा है, टकराव बढ़ रहा है और जनता विभाजन की ओर बढ़ती चली जा रही है… क्या ऐसे नेता अपने क्षेत्रों के तंग हाल कंगालों के बच्चों को असहाय अवस्था में नहीं देखे हैं, जिनके लिए ये लोग क्या कर रहे हैं?”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 7353 व 6234)
भविष्य का रास्ता क्या है?
- इतिहास से सबक लें, बदला नहीं: इतिहास अतीत की गलतियों को समझने के लिए होता है ताकि हम उन्हें दोबारा न दोहराएं। आज के नागरिक 400 साल पहले के किसी राजा या आक्रांता के किए के ज़िम्मेदार नहीं हैं।
- सवालों की दिशा बदलिए: जब भी कोई नेता इतिहास, मंदिर, मस्जिद या जाति की बात छेड़े, तो उससे हाथ जोड़कर पूछिए—“साहब, वो तो ठीक है, लेकिन यह बताइए कि हमारे जिले में नया सरकारी कॉलेज और रोज़गार कब आएगा?”
- वैज्ञानिक सोच और राष्ट्रीय एकता: किसी भी देश की महानता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसका अतीत कैसा था, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने वर्तमान नागरिकों को कितनी खुशहाली, सुरक्षा और वैज्ञानिक प्रगति दे रहा है।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या हम अतीत के मुर्दों को कब्र से निकालकर आपस में लड़ते रहेंगे, या अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए एक आधुनिक और एकजुट भारत बनाएंगे?
इतिहास के फर्जी दावों, साम्प्रदायिक राजनीति की साजिशों और भारत के सच्चे स्वरूप को जानने के लिए विमला सिंह और एन. सिंह की आंखें खोल देने वाली पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का 24वां अध्याय ज़रूर पढ़ें।
इन प्रतिनिधियों के बीच शासन सत्ता के लिए आपसी ईर्ष्या अंदर से जारी है और वाणी से ये लोग जनता को गुमराह कर देते हैं, लेकिन ये नेता अपने आपसी शारीरिक चोट से हमेशा बचे रहते हैं... जबकि इनके व्यथित करने वाले शब्द-बाण, सामान्य जनता के हृदय को भेद रहे हैं और जनता विभाजन की ओर बढ़ती चली जा रही है।