जातीय जनगणना कराना इतना आसान क्यों नहीं है? (उपजातियां, नए सरनेम और आधुनिक उलझनें)
एन. सिंह · ·5 मिनट
मान लीजिए आपके स्कूल में खेलकूद प्रतियोगिता हो रही है और मास्टर जी को बच्चों को उनकी लम्बाई के हिसाब से तीन टीमों में बांटना है। एक टीम 4 फुट वालों की, दूसरी 4.5 फुट वालों की, और तीसरी 5 फुट वालों की। यह काम आसान है, क्योंकि फीते से नापकर सच तुरंत पता चल जाता है।
लेकिन अब कल्पना कीजिए कि मास्टर जी से कहा जाए कि हर बच्चे से पूछो कि उसके परदादा का असली गोत्र और खानदान क्या था, और उसी हिसाब से टीम बनाओ!
अब मुसीबत शुरू होगी। कोई बच्चा अपने दादा का पुराना उपनाम बताएगा, कोई नया फैशनेबल सरनेम बताएगा, कोई कहेगा कि मेरी माँ दूसरी जाति की हैं और पिताजी दूसरी जाति के, तो मैं किसमें जाऊँ?
आज जब टीवी पर नेताजी बड़े जोश में कहते हैं कि “देश में तुरंत जातीय जनगणना कराओ”, तो सुनने में लगता है कि यह दो दिन का काम है। लेकिन ज़मीनी हकीकत में यह काम इतना पेचीदा और उलझा हुआ है कि इसे बिना सोचे-समझे करना प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टि से भारी बवाल खड़ा कर सकता है।
सरनेम का बदलता चेहरा (संस्कृतिकरण)
भारत में जातियों का ढांचा कभी स्थिर नहीं रहा। पिछले 50-60 सालों में सामाजिक प्रतिष्ठा पाने के लिए या आरक्षण का लाभ लेने के लिए कई जातियों ने अपने पारंपरिक नाम बदलकर नए और बड़े उपनाम अपना लिए हैं।
मिसाल के तौर पर:
- कई इलाकों में अहीर समाज ने ‘यादव’ और ‘यदुवंशी’ पहचान को मुख्य बना लिया।
- कोइरी और काछी समाज ने ‘मौर्य’ और ‘शाक्य’ उपनाम लिखना शुरू कर दिया ताकि वे सम्राट अशोक और बुद्ध कालीन गौरव से जुड़ सकें।
- कुर्मी समाज में ‘पटेल’ सरनेम इतना व्यापक हो गया कि अब उसमें दर्जनों अलग-अलग क्षेत्रीय उपजातियां समाहित हो चुकी हैं।
- सैंथवार जैसी स्वतंत्र ऐतिहासिक पहचान रखने वाले समाजों का कुर्मी उपजाति के रूप में विलय और आरक्षण लाभों की खींचतान ने आंकड़ों के मिलान को बेहद जटिल बना दिया है।
अब सोचिए, जब जनगणना करने वाला कोई सरकारी शिक्षक किसी घर में जाएगा और पूछेगा कि आपकी जाति क्या है, तो गृहस्वामी जो मुँह से बोलेगा (Self-declaration), क्या कर्मचारी के पास उसकी जांच करने का कोई डीएनए टेस्ट या 100 साल पुराना रिकॉर्ड होगा? बिल्कुल नहीं!
21वीं सदी की नई पीढ़ी और अंतरजातीय विवाह
एक और बड़ा बदलाव जो पिछले दो दशकों में भारत के शहरों और कस्बों में तेज़ी से हुआ है, वह है अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह।
आज लाखों ऐसे परिवार हैं जहाँ पिता पिछड़े वर्ग से हैं और माता अगड़ी जाति से हैं, या माता दलित समाज से हैं और पिता किसी अन्य समुदाय से हैं। उनके बच्चों की जाति क्या मानी जाएगी? क्या केवल पिता की जाति लागू होगी? यदि हाँ, तो संविधान में महिलाओं की बराबरी के अधिकार का क्या होगा?
इसके अलावा, आज के दौर में सरोगेसी, टेस्ट-ट्यूब बेबी और एकल अभिभावक (सिंगल पेरेंट) जैसे आधुनिक पारिवारिक स्वरूप भी सामने आ रहे हैं। क्या ऐसे बच्चों पर ज़बरदस्ती पुरानी सामंती जाति का ठप्पा लगाया जा सकता है?
किताब से कड़वा सच
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ की प्रस्तावना में इस तकनीकी और प्रशासनिक संकट को बहुत गहराई से रेखांकित करते हैं:
“सटीक जातीय जनगणना का परिणाम पाने के लिए सरकार के समक्ष एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गंभीर समस्या यह है कि विजातीय समूहों की गणना कैसे की जाए, यथा - आगामी जातीय जनगणना में सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती जातियों का सटीक वर्गीकरण और उनकी वास्तविक संख्या का निर्धारण होगी। अहीर का यादव व यदुवंशी बनना, कोइरी व काछी का मौर्य तथा शाक्य पहचान अपनाना, और कुर्मी समाज द्वारा पटेल सरनेम को ही मुख्य जातीय पहचान बना लेना जैसी प्रक्रियाएं सांस्कृतिकरण और वृहद सामाजिक पहचान निर्माण के उदाहरण हैं… ऐसे लाखों मामले भारत भर में मौजूद हैं जहां नई-पुरानी पहचानों के बीच का अंतर धुंधला हो रहा है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, प्रस्तावना, पृष्ठ 5)
वे आगे लिखते हैं:
“स्व-घोषणा (Self-declaration) पर आधारित इस व्यवस्था में बिना किसी ठोस दस्तावेजों या वैज्ञानिक सत्यापन के वास्तविक वंशानुगत पृष्ठभूमि की जांच करना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है। ऐसे में सीमित प्रशासनिक संसाधनों, राजनीतिक दबावों और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच एक प्रामाणिक और विवाद-रहित जातीय आंकड़ा तैयार करना नीति-निर्माताओं के लिए एक बड़ी कसौटी होगी।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 6)
असली रास्ता क्या होना चाहिए?
- स्पष्ट नीति और वैज्ञानिक मानक: यदि सरकार जातीय जनगणना की ओर बढ़ती भी है, तो पहले जातियों और उपजातियों के वर्गीकरण की एक पारदर्शी, राष्ट्रव्यापी नियमावली बने ताकि फर्जी दावों पर रोक लगे।
- अंतरजातीय परिवारों के लिए विकल्प: जिन युवाओं और परिवारों ने जाति के बंधनों को तोड़कर विवाह किया है, उनके लिए फॉर्म में “कोई जाति नहीं (No Caste)” का सम्मानजनक विकल्प अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
- डेटा का दुरुपयोग रोकने की गारंटी: यह सुनिश्चित किया जाए कि इस डेटा का इस्तेमाल चुनाव आयोग द्वारा जातिगत आधार पर सीटों की हेराफेरी या नफरत फैलाने में न हो सके।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या आज का भारत 1931 के भारत जैसा है? 95 साल पुरानी व्यवस्था को आज के डिजिटल और बदलते समाज पर थोपने की यह ज़िद हमें आगे ले जाएगी या पीछे?
जातीय जनगणना की इन पेचीदा प्रशासनिक बारीकियों, कानूनी विवादों और सामाजिक सच्चाइयों को निष्पक्ष दृष्टि से समझने के लिए लेखक एन. सिंह की किताब ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ की प्रस्तावना और अध्याय 12 का अध्ययन ज़रूर करें।
आगामी जातीय जनगणना में सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती जातियों का सटीक वर्गीकरण और उनकी वास्तविक संख्या का निर्धारण होगी।