अनाज उगाने वाला किसान कर्ज़ में क्यों मरता है?
एन. सिंह · ·4 मिनट
बाज़ार में जब आप एक पैकेट चिप्स खरीदने जाते हैं, तो उस पर साफ लिखा होता है: ₹20।
उस बीस रुपये के पैकेट में केवल आधा आलू होता है! चिप्स बनाने वाली कंपनी आलू की कीमत, पैकेजिंग का खर्च, अपना मुनाफा और दुकानदार का कमीशन सब जोड़कर वह दाम तय करती है। आप या कोई भी दुकानदार उस कंपनी से यह नहीं कह सकता कि “नहीं, हम तो इसे पाँच रुपये में ही लेंगे।”
लेकिन अब ज़रा उस किसान के बारे में सोचिए जिसने उस आलू को पैदा किया है।
कड़कड़ाती ठंड में रात के दो बजे वह खेत में पानी लगाता है। जून की चिलचिलाती धूप में उसका शरीर काला पड़ जाता है। वह खाद, कीटनाशक, बीज और ट्रैक्टर का डीज़ल सब कुछ बाज़ार से भारी कर्ज़ लेकर खरीदता है।
लेकिन जब चार महीने की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद उसकी फसल तैयार होती है और वह ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर मंडी पहुँचता है, तो क्या वह अपनी फसल की कीमत खुद तय कर सकता है?
नहीं! मंडी का आढ़ती और दलाल तय करता है कि किसान का आलू दो रुपये किलो बिकेगा या तीन रुपये किलो! कई बार तो हालत यह होती है कि फसल की बिक्री से किसान का भाड़ा तक नहीं निकलता और वह रोते हुए अपनी फसल सड़क पर फेंकने को मजबूर हो जाता है।
जो पूरे देश को खाना खिलाता है, वह खुद कर्ज़ के बोझ तले दबकर आत्महत्या क्यों कर रहा है?
खाद-बीज महंगा, उपज कौड़ियों के भाव
किसान के घाटे का गणित बहुत सीधा और दर्दनाक है:
- लागत में चौतरफा आग: खाद की बोरी हर साल महंगी हो रही है और उसका वज़न 50 किलो से घटाकर 45 किलो कर दिया गया। डीज़ल के दाम आसमान पर हैं। कीटनाशक दवाएं नकली मिल रही हैं और बिजली के बिल भारी आ रहे हैं।
- फसल आते ही बाज़ार का गिरना: जैसे ही किसान की फसल कटती है, बड़े व्यापारी और कॉरपोरेट मिलकर बाज़ार में कृत्रिम मंदी ला देते हैं। किसान के पास फसल को रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज या गोदाम नहीं होता, और उसे अगली फसल की बुवाई के लिए नकद पैसे चाहिए होते हैं। लाचारी में वह अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेच देता है।
- उपभोक्ता की जेब कटती है: वही आलू या प्याज दो महीने बाद जब शहर के आम उपभोक्ता की रसोई में पहुँचता है, तो वह 40 से 50 रुपये किलो बिकता है! बीच का सारा मुनाफा वे बिचौलिए और जमाखोर डकार जाते हैं जिन्होंने खेत में कभी एक बूंद पसीना नहीं बहाया।
किताब से कड़वा सच
लेखक विमला सिंह एवं एन. सिंह ने अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ को देश के अन्नदाता को समर्पित करते हुए लिखा है:
“प्रस्तुत पुस्तक भारतीय किसान एवं भारतीय सेना के सम्मान में समर्पित… भारत का लोकतंत्र, जिसकी नींव समानता और न्याय पर रखी गई है, आज अवसरवाद के दलदल में फँसकर अपनी आत्मा खो चुका है… पर सबसे बड़ा प्रश्न है - इसका पीड़ित कौन है ? इसका पीड़ित है गरीब किसान, जो दिन-रात खेत जोतकर भी कर्ज़ में दबा मरता है… यह अवसरवादी लोकतंत्र उन्हीं लोगों को कुचल रहा है, जिनके बलिदानों और वोटों पर इसकी नींव टिकी है।”
— विमला सिंह, एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 3 व 189)
वे आगे नेताओं के पाखंड पर लिखते हैं:
“सामाजिक भाषणों में बातें आदर्श की की जा रही हैं… जो किसानों के संरक्षक बने हैं, वही किसानों को मौत के घाट उतार रहे हैं… हर साल ये वादे किये जाते हैं कि अगले 5 वर्षों में किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी, लेकिन अगले पाँच वर्षों के बाद नये निज़ाम फिर वही वादे करते दिखते हैं। आम किसान उनके लिए मतदाता के इतर कुछ भी नहीं रहता।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 3248 व 4684)
किसान को संकट से निकालने का रोडमैप
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी: किसान की किसी भी फसल की खरीद स्वामीनाथन आयोग के फॉर्मूले (लागत + 50% मुनाफा) से कम पर होना कानूनन अपराध घोषित हो।
- गाँव स्तर पर सौर ऊर्जा संचालित भंडारण: हर पंचायत स्तर पर किसानों के लिए मुफ्त या नाममात्र शुल्क पर कोल्ड स्टोरेज और गोदाम बनाए जाएं ताकि किसान अपनी फसल को मजबूरी में न बेचे।
- कृषि आधारित लघु उद्योग: गाँव का कच्चा माल गाँव में ही प्रोसेस हो (जैसे टमाटर की सॉस, आलू के चिप्स, सरसों का तेल), जिससे गाँव के युवाओं को रोज़गार मिले और किसान को अपनी उपज का सही मूल्य मिले।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
यदि देश का किसान खेती छोड़ देगा और कर्ज़ में मर जाएगा, तो क्या 21वीं सदी का भारत सोने-चांदी के सिक्के खाकर ज़िंदा रहेगा?
भारतीय कृषि संकट, किसानों की अनदेखी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की इस सच्ची गाथा को जानने के लिए विमला सिंह और एन. सिंह की पुस्तक ‘अनोखा भारत’ की प्रस्तावना और आठवां अध्याय ज़रूर पढ़ें।
प्रस्तुत पुस्तक भारतीय किसान एवं भारतीय सेना के सम्मान में समर्पित... इसका पीड़ित कौन है ? इसका पीड़ित है गरीब किसान, जो दिन-रात खेत जोतकर भी कर्ज़ में दबा मरता है।