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किचन पॉलिटिक्स बनाम असली बराबरी — घर के फैसले और संसद की कुर्सी

एन. सिंह · ·4 मिनट

आजकल सोशल मीडिया और टीवी डिबेट्स में ‘नारी सशक्तिकरण’ (Women Empowerment) पर बहुत जोरदार बहसें होती हैं।

अक्सर यह बहस इस बात पर आकर अटक जाती है कि—“आज सुबह की चाय पति बनाएगा या पत्नी?” या “किचन का काम सिर्फ औरत का क्यों हो?” इसे कई विचारक चुटकी लेते हुए ‘किचन पॉलिटिक्स’ कहते हैं।

किसी भी आठवीं के बच्चे को यह बात समझ में आ सकती है कि घर के छोटे-मोटे कामों में एक-दूसरे की मदद करना अच्छी बात है, यह तो हर समझदार परिवार में सदियों से होता रहा है। लेकिन क्या महिला सशक्तिकरण का मतलब सिर्फ घर के चूल्हे-चौके का झगड़ा है?

असली सवाल यह है कि: क्या हमारे समाज में महिलाओं को अपनी पढ़ाई चुनने, अपनी पसंद से काम करने, अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा पाने और अपने जीवन के बड़े फैसले खुद लेने का अधिकार सचमुच मिल रहा है?


पश्चिमी नकल बनाम भारतीय हकीकत

लेखक एन. सिंह और विमला सिंह भारतीय समाज के बदलते ताने-बाने पर बहुत गहराई से विचार करते हैं। वे लिखते हैं कि पिछले कुछ दशकों में पश्चिम से उधार लिए गए कुछ उथले विचारों ने हमारे विमर्श को बिगाड़ दिया है।

पश्चिम के कुछ नारीवादी आंदोलनों ने यह सिखाने की कोशिश की कि परिवार एक बोझ है, पति-पत्नी एक-दूसरे के दुश्मन हैं और परंपराएं केवल बेड़ियां हैं। इसका नतीजा क्या हुआ?

  • पारिवारिक टूटन बढ़ गई।
  • छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते अदालतों के चक्कर लगाने लगे।
  • आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी दिखावा तो बढ़ गया, लेकिन ज़मीन पर गाँव और कस्बों की महिला आज भी सुरक्षित नहीं है।

आज भी किसी लड़की को अकेले रात में या किसी छोटे शहर की सड़क पर सुरक्षित निकलने में डर लगता है। जब तक कोई समाज अपनी बेटियों को सड़कों पर बिना भय के चलने की सुरक्षा नहीं दे सकता, तब तक संसद में 33% आरक्षण का ढिंढोरा पीटना केवल एक राजनीतिक छलावा है।


किताब से कड़वा सच

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के 24वें अध्याय में इस मुद्दे पर बेबाक टिप्पणी करते हैं:

“गांधी जी के बाद वर्तमान समय में, विशेषकर 1985 से नारी सशक्तिकरण का विचार पनप रहा था, जो पौधा 2006 में जवान हुआ, उसमें इस समय फल आने लगा है। नारीवादी विचार में उनको स्वतंत्रता, न्याय, शक्ति, अधिकार सब चाहिए, लेकिन इन्हें इस तरह का लोकतंत्र पसंद नहीं हैं। नारीवादी व्यवस्था में राजनीति की लड़ाई घर से शुरू होनी चाहिए, वह भी ‘किचन’ से। किचन पॉलिटिक्स हावी है… इनकी राजनीति पति-पत्नी के बीच से शुरू होती है कि आज की चाय कौन बनायेगा, ये जेण्डर की बात करते हैं… बात अंदर की है, बाहर की नहीं। वर्तमान समय में पूरा सामाजिक थियेटर बदल दिया गया है जिसके लिए समाज के लोग तो ज़िम्मेदार ही हैं, लेकिन वोट के लिए सरकारें नारीवादी व्यवस्था पर पूरा ज़ोर लगाये बैठी रहती हैं।”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 614 / 7339)

वे महिलाओं की सुरक्षा और समाज के गिरते चरित्र पर आगे लिखते हैं:

“आज के युग में शहर हो या देहात, लड़कियाँ/औरतें स्वच्छ हवा में घूम नहीं सकती हैं। यदि कहीं वो टहलने निकलें, तो पीछे से गुंडे, मवालियों का गिरोह चल देता है। इन सबको न सरकार का डर है, न ही समाज का, न ही भगवान् का… चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के प्रशासन का वर्णन करते हुए कालिदास लिखते हैं—‘बागीचों में झूले पर झूलती हुई सुंदरियों को आदमी क्या हवा भी उनके वस्त्रों को नहीं छू सकता था।’ जबकि वो राजतंत्र था। आज लोकतंत्र में ऐसी दुर्दशा क्यों है?”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 6348)


सच्ची बराबरी का पैमाना क्या है?

  1. सुरक्षा और कानून का खौफ: किसी भी महिला के लिए सबसे पहली आज़ादी है ‘भय से मुक्ति’। जब तक सड़कों और कार्यस्थलों पर महिलाओं से छेड़छाड़ करने वालों पर कठोरतम कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आरक्षण बेमानी है।
  2. पारिवारिक सामंजस्य और सम्मान: स्त्री और पुरुष विरोधी नहीं, बल्कि एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं। बराबरी का मतलब टकराव नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और जिम्मेदारी का साझा होना है।
  3. चरित्र निर्माण और नैतिक शिक्षा: दिखावे और केवल वोट बैंक की नीतियों के बजाय समाज में ऐसी शिक्षा दी जाए जहाँ हर पुरुष हर स्त्री को अपनी माँ-बहन की तरह सम्मान की दृष्टि से देखे।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या हम महिलाओं को सिर्फ संसद का चुनावी मोहरा बना रहे हैं, या सचमुच उन्हें वह आत्मसम्मान और सुरक्षा देने को तैयार हैं जिसकी वे हक़दार हैं?

नारीवाद के पश्चिमी भ्रम, भारतीय परिवार के वास्तविक मूल्यों और सामाजिक संतुलन की इस गंभीर पड़ताल को पढ़ने के लिए विमला सिंह और एन. सिंह की पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का 24वां अध्याय अवश्य पढ़ें।

नारीवादी व्यवस्था में राजनीति की लड़ाई घर से शुरू होनी चाहिए, वह भी ‘किचन’ से। किचन पॉलिटिक्स हावी है... लेकिन बात अंदर की है, बाहर की नहीं। जब तक घर की औरत अपने जीवन का फैसला खुद नहीं लेगी, तब तक पंचायत क्या, संसद में बैठी औरत भी किसी और की प्रॉक्सी ही रहेगी।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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