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मकान और योजनाएं किसे मिलें? झुग्गी-झोपड़ी और असली भूमिहीन बनाम कागज़ी गरीब

एन. सिंह · ·4 मिनट

आप कभी किसी गाँव या कस्बे से गुज़रें, तो एक अजीब नज़ारा देखने को मिलता है।

एक तरफ एक दोमंज़िला पक्का मकान है, जिसके दरवाज़े पर ट्रैक्टर और मोटरसाइकिल खड़ी है। उस घर की दीवार पर नीले या पीले रंग के पेंट से लिखा होता है—“प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना, लाभार्थी: फलाने सिंह या फलाने यादव।”

अब ज़रा उसी गाँव के बाहर नहर की पटरी या रेलवे लाइन के किनारे चलिए।

वहाँ बांस की खपच्चियों पर फटी हुई काली पॉलीथीन बांधकर चार बच्चे सर्दी में ठिठुर रहे हैं। बारिश होती है तो पानी उनके बिस्तर पर टपकता है। जब उनसे पूछिए कि “तुम्हें सरकारी मकान क्यों नहीं मिला?” तो उस गरीब की आँखें भर आती हैं। वह कहता है—“बाबूजी! पंचायत में नाम लिखवाने के लिए पटवारी और दलाल बीस हज़ार रुपये मांग रहे थे। हमारे पास खाने को नहीं है, हम घूस कहाँ से लाते?”

यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। यह आज़ादी के 78 साल बाद के भारत की सबसे कड़वी ज़मीनी सच्चाई है।


कागजी गरीब और असली बेघर का फर्क

हमारे देश में कल्याणकारी योजनाओं (Welfare Schemes) की कोई कमी नहीं है। हर बजट में हज़ारों करोड़ रुपये गरीबों के मकान, राशन और इलाज के नाम पर जारी होते हैं। लेकिन वह पैसा पहुँचता कहाँ है?

वह पैसा पहुँचता है उन चालाक लोगों तक जिनके पास ब्लॉक, तहसील और थाने तक पहुँच है। जो पंचायत में प्रधान जी की हाँ में हाँ मिलाते हैं। जिनके पास रिश्वत देने के लिए नकद पैसा है। वे अपने पक्के मकान के ऊपर छप्पर डालकर फोटो खिंचवा लेते हैं और खुद को ‘गरीब’ साबित कर देते हैं।

वहीं दूसरी ओर, असली गरीब—जिसके पास न एक बीघा ज़मीन है, न कोई सिफारिश, न कोई जातिगत दबंगई—वह इन सरकारी सूचियों से हमेशा के लिए गायब रहता है। जब नेताजी वोट मांगने आते हैं, तो उसे 5 किलो अनाज का झोला थमाकर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं, लेकिन उसके सिर पर पक्की छत कभी नहीं बन पाती।


किताब से कड़वा सच

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ में इस लूटतंत्र पर सीधा हमला बोलते हैं। वे लिखते हैं:

“इसी प्रक्रम में केवल भूमिहीनों के मुखिया को मकान मिलना चाहिए, चाहे वो झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले हों या शहरों/देहातों में रहने वाले भूमिहीन, जिनका अपने पास कोई मकान नहीं है। वोट के बाज़ीगरी से अब काम नहीं चलने वाला। जैसा कि विगत 78 वर्षों से प्रत्येक सरकार कम या अधिक भारत का ताना-बाना खराब करते चली आ रही हैं और अब वोट बाज़ीगरों की मंशा भारत को तार-तार कर देने वाली है।”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 5)

गाँव के विकास के झूठे दावों पर लेखक आगे लिखते हैं:

“गाँव का कोटेदार सारा राशन खुद ही अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ डकार जाता है तथा जो मिट्टी का तेल तमाम गरीबों के घरों को रोशन करने के लिए भेजा जाता है, वह खुद ही पी जाता है। ज़मींदारों के बंधन से मुक्त हुए, परन्तु ग्राम स्वराज के सपने वाले लोकतंत्रीय भारत में ग्राम प्रधान जी भी कुछ ख़ास करते नजर नहीं आते हैं। गाँव की टूटी सड़कें उन्होंने फाइलों में ही बनायीं और असल में गाँव का नक्शा दिन-ब-दिन बद-से-बदसूरत ही होता गया।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 4684)


समाधान का सटीक पैमाना

अगर सरकार सचमुच ईमानदार है, तो मकान और सरकारी राहत बांटने का पैमाना चुटकियों में ठीक किया जा सकता है:

  1. शर्त केवल एक: ‘भूमिहीनता’: सरकारी आवास योजना का लाभ केवल उस परिवार के मुखिया को मिले जिसके पास पूरे देश में कहीं भी पक्का मकान या कृषि योग्य भूमि नहीं है।
  2. स्थानीय स्तर पर खुली वीडियोग्राफी: बंद कमरों या फाइलों में सूची बनाने के बजाय पूरी ग्राम सभा और मोहल्ले के लोगों के सामने लाभार्थियों के घरों की जांच हो।
  3. फर्जीवाड़ा करने वालों पर जेल और वसूली: जो संपन्न लोग फर्जी बीपीएल कार्ड या आवास का पैसा डकारते हैं, उनसे ब्याज सहित वसूली की जाए और दलालों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या गरीबों की गरीबी दूर करना नेताओं का असली लक्ष्य है, या उन्हें हमेशा गरीब और लाचार बनाए रखना ताकि वे हर पांच साल बाद राशन के पैकेट पर वोट देते रहें?

भारत के ग्रामीण अर्थतंत्र, भ्रष्टाचार की सांठगांठ और सच्चे अंत्योदय की राह को गहराई से जानने के लिए विमला सिंह और एन. सिंह की आंखें खोल देने वाली पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का अध्ययन ज़रूर करें।

केवल भूमिहीनों के मुखिया को मकान मिलना चाहिए, चाहे वो झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले हों या शहरों/देहातों में रहने वाले भूमिहीन, जिनका अपने पास कोई मकान नहीं है। वोट के बाज़ीगरी से अब काम नहीं चलने वाला।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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