मंडल से पंचायत तक — गाँव में सत्ता आई या गाँव टुकड़ों में बँट गया?
एन. सिंह · ·4 मिनट
पुराने ज़माने की कहानियों में जब हम भारतीय गाँव की तस्वीर पढ़ते हैं, तो प्रेमचंद के ‘पंच परमेश्वर’ की याद आती है। गाँव में कोई विवाद होता था, तो बड़े-बुजुर्ग पीपल के पेड़ के नीचे बैठते थे और जो फैसला होता था, उसे ईश्वर का फैसला मानकर सब सिर झुका लेते थे। किसी गरीब की बेटी का ब्याह हो, तो हर जाति का व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करता था।
लेकिन आज ज़रा किसी भी गाँव में जाकर देखिए।
वहाँ पीपल के पेड़ के नीचे अब पंचायत नहीं बैठती, बल्कि गुटबाजी और शराब की बोतलें खुलती हैं!
गाँव तीन-चार जातियों और टोलों में ऐसा बँट चुका है कि एक टोले का रास्ता दूसरे टोले से बंद कर दिया जाता है। नाली का गंदा पानी किसके दरवाज़े पर बहेगा, इस बात पर लाठियां चल जाती हैं। और जब प्रधानी का चुनाव आता है, तो पाँच साल के लिए भाई-भाई का बैरी बन जाता है।
यह सवाल बहुत गंभीर है: 1990 के दशक में जब मंडल आयोग और 73वां संविधान संशोधन लागू हुआ, तो सपना था कि गाँव के गरीब को सत्ता मिलेगी। लेकिन क्या गाँव को सचमुच सत्ता मिली, या गाँव हमेशा के लिए विखंडित (टुकड़े-टुकड़े) हो गया?
सत्ता का विकेंद्रीकरण या भ्रष्टाचार का विकेंद्रीकरण?
संविधान निर्माताओं का विचार बहुत नेक था। वे चाहते थे कि दिल्ली या लखनऊ में बैठे बड़े अफसरों के बजाय गाँव के लोग खुद तय करें कि उनके स्कूल, खड़ंजे और कुएं कहाँ बनेंगे। इसे ‘सत्ता का विकेंद्रीकरण’ (Decentralization of Power) कहा गया।
लेकिन व्यवहार में क्या हुआ?
गाँव में सत्ता के साथ-साथ करोड़ों रुपयों का सरकारी बजट पहुँचने लगा। उस पैसे को देखकर गाँव के दबंगों और दलालों की लार टपकने लगी। अब प्रधानी का चुनाव सेवा के लिए नहीं, बल्कि सरकारी फंड लूटने का सबसे बड़ा धंधा बन गया।
चुनाव जीतने के लिए:
- वोटरों को साड़ियां, शराब और नकद पैसे बांटे जाने लगे।
- जातियों की गोलबंदी इतनी तीखी कर दी गई कि अपनी जाति का निकम्मा उम्मीदवार भी ‘शान’ का प्रतीक बन गया।
- चुनाव खत्म होने के बाद जो प्रधान बना, उसने सबसे पहले विरोधी टोले का विकास रोका, राशन की सूची से उनके नाम कटवाए और पुलिस से मिलकर उन पर फर्जी मुकदमे लगवाए।
गाँव का पारंपरिक भाईचारा पूरी तरह जलकर खाक हो गया।
किताब से कड़वा सच
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ और ‘गिनती से सत्ता तक’ में ग्रामीण लोकतंत्र की इस त्रासदी पर बड़ा तीखा कटाक्ष करते हैं:
“गाँव का कोटेदार सारा राशन खुद ही अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ डकार जाता है तथा जो मिट्टी का तेल तमाम गरीबों के घरों को रोशन करने के लिए भेजा जाता है, वह खुद ही पी जाता है। ज़मींदारों के बंधन से मुक्त हुए, परन्तु ग्राम स्वराज के सपने वाले लोकतंत्रीय भारत में ग्राम प्रधान जी भी कुछ ख़ास करते नजर नहीं आते हैं। गाँव की टूटी सड़कें उन्होंने फाइलों में ही बनायीं और असल में गाँव का नक्शा दिन-ब-दिन बद-से-बदसूरत ही होता गया। आजकल के प्रधान जी लोग विकास की योजनायें बी.डी.ओ. के माध्यम से स्वयं ही डकारते हैं।”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 4684)
वे प्रेमचंद के उपन्यास का संदर्भ देते हुए आगे लिखते हैं:
“हाँ, इतना तो ज़रूर है कि प्रेमचन्द के गोदान में थानेदार को पैसा दिलाने में जो भूमिका दातादीन, झिंगुरी सिंह, नोखे लाल और पटेश्वरी लाला की थी, उस भूमिका को आज के नेता और प्रधान अच्छी तरह निभा रहे हैं। विधायक, मंत्री, तमाम उच्चाधिकारी सबमें भ्रष्टाचार की साझी सहमति हो गयी है। आम जनता की हालत आसमान से गिरकर खजूर पर अटकने वाली ही हो गयी है।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 4684)
गाँव को टूटने से कैसे बचाएं?
- खुली ग्राम सभा में ऑडिट: गाँव के विकास का एक-एक रुपया किस काम में लगा, इसका हिसाब बंद फाइलों में नहीं, बल्कि साल में दो बार गाँव के सभी मतदाताओं के सामने सार्वजनिक मंच पर पढ़ा जाए।
- दलगत और जातिगत राजनीति पर रोक: पंचायत चुनाव में जातियों के आधार पर नफरत फैलाने वाले उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित किया जाए।
- सच्चे ग्राम स्वराज की वापसी: महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज केवल चुनाव लड़ना नहीं था, बल्कि गाँव को आर्थिक, शैक्षिक और नैतिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना था। जब तक गाँव में कुटीर उद्योग और अच्छे स्कूल नहीं होंगे, तब तक नौजवान शहरों की ओर भागते रहेंगे।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या पंचायती राज ने सचमुच लोकतंत्र को मजबूत किया है या गाँव के ताने-बाने को सत्ता की आग में झोंक दिया है?
मंडल आंदोलन से लेकर आज की त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था के इस अनकहे सच और ग्रामीण भारत के अंतर्द्वंद्व को समझने के लिए एन. सिंह की किताब ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का 13वां अध्याय अवश्य पढ़ें।
ज़मींदारों के बंधन से मुक्त हुए, परन्तु ग्राम स्वराज के सपने वाले लोकतंत्रीय भारत में ग्राम प्रधान जी भी कुछ ख़ास करते नजर नहीं आते हैं। गाँव की टूटी सड़कें उन्होंने फाइलों में ही बनायीं और असल में गाँव का नक्शा दिन-ब-दिन बद-से-बदसूरत ही होता गया।