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नारी शक्ति वंदन अधिनियम और परिसीमन — 33% का वादा कब और कैसे सच होगा?

एन. सिंह · ·5 मिनट

मान लीजिए आपके जन्मदिन पर आपके पिताजी एक बहुत सुंदर साइकिल की तस्वीर दिखाते हैं और कहते हैं—“बेटा! यह साइकिल तुम्हारी हो गई, हमने इसका कागज़ बनवा लिया है!”

आप खुशी से उछल पड़ते हैं और कहते हैं—“पिताजी, चाबी दीजिए, मैं अभी चलाऊंगा!”

लेकिन तभी पिताजी मुस्कुरा कर कहते हैं—“अरे रुको! पहले हम घर की दीवारों का नया रंग करवाएंगे, फिर पूरे मोहल्ले की सड़क नई बनेगी, उसके बाद जब तुम दसवीं पास कर लोगे, तब यह साइकिल दुकान से घर आएगी!”

अब बताइए, क्या उस कागजी तोहफे का आपको तुरंत कोई लाभ मिला?

सितंबर 2023 में जब देश की संसद ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संविधान संशोधन) पास किया, तो देश की आधी आबादी के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। कानून तो बन गया, लेकिन उसके लागू होने पर ऐसी दो भारी शर्तें लगा दी गईं कि यह कानून अगले कई सालों तक सिर्फ फाइलों में ही कैद रहेगा।


वे दो शर्तें क्या हैं?

इस कानून के लागू होने के रास्ते में दो सबसे बड़े ताले लगाए गए हैं:

  1. नई जनगणना (Census): कानून कहता है कि महिला आरक्षण तभी लागू होगा जब देश में अगली आधिकारिक जनगणना पूरी हो जाएगी और उसके आंकड़े प्रकाशित हो जाएंगे।
  2. सीटों का परिसीमन (Delimitation): जनगणना के आंकड़ों के आधार पर पूरे देश की लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाएं दोबारा तय की जाएंगी (परिसीमन होगा)। उसके बाद ही तय होगा कि कौन सी सीट महिलाओं के लिए आरक्षित होगी।

अब सवाल यह उठता है कि जब 73वें और 74वें संशोधन के तहत नगर पालिकाओं और पंचायतों में बिना परिसीमन के तुरंत 33% आरक्षण लागू हो सकता था, तो देश की संसद और विधानसभाओं में इसे तुरंत लागू क्यों नहीं किया गया?


परिसीमन का असली सियासी पेंच

लेखक एन. सिंह हमें समझाते हैं कि यह मामला सिर्फ महिलाओं की 33% सीटों का नहीं है, बल्कि इसके पीछे पूरे भारत की राजनीति का नक्शा बदलने का एक विशाल खेल चल रहा है जिसे ‘लॉन्ग टर्म पॉलिटिकल रिस्ट्रक्चरिंग’ कहा जाता है।

परिसीमन का मतलब है जनसंख्या के हिसाब से सीटों का बंटवारा:

  • उत्तर भारत के राज्य (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान) जहाँ आबादी तेज़ी से बढ़ी है, वहाँ लोकसभा की सीटें भारी संख्या में बढ़ जाएंगी।
  • दक्षिण भारत के राज्य (जैसे केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश) जिन्होंने पिछले 40 सालों में देश के हित में परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को सख्ती से लागू किया, उनकी सीटें अनुपात में घट जाएंगी या उनका राजनीतिक प्रभाव कम हो जाएगा।

दक्षिण के राज्य इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि “क्या जनसंख्या नियंत्रित करने की सज़ा हमें यह मिलेगी कि संसद में हमारी आवाज़ कमज़ोर हो जाए?”

अब सोचिए, जिस परिसीमन पर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच इतना बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक टकराव तय है, उस परिसीमन के साथ महिला आरक्षण को बांध देने का मतलब क्या है? इसका सीधा मतलब है कि महिला आरक्षण को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया गया है जहाँ फैसला होना बहुत मुश्किल है।


किताब से कड़वा सच

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के सातवें और आठवें अध्याय में इस कानूनी दांवपेंच का पर्दाफाश करते हुए लिखते हैं:

“उपर्युक्त सभी बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने वर्ष 2023 का महिला आरक्षण कानून “नारी शक्ति वंदन अधिनियम”, जो अब कानून बन चुका है, पहली नजर में महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देनेवाला एक ऐतिहासिक कदम है। यह एक साधारण कानून नहीं, बल्कि संवैधानिक संशोधन (106वां संशोधन) है… लेकिन इस कानून की असली प्रकृति तब समझ में आती है, जब इसके लागू होने की शर्तों पर ध्यान दिया जाता है। इसे तत्काल प्रभाव से लागू नहीं किया गया, बल्कि इसके लिए दो महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ अनिवार्य रखी गयीं। पहले नई जनगणना और बाद में परिसीमन (डिलिमिटेशन)। इन दोनों के कारण यह आरक्षण नहीं रहता, बल्कि लांग टर्म पॉलिटिकल रिस्ट्रक्चरिंग का संकेत बन जाता है, क्योंकि जनगणना समाज की वास्तविक संख्या और संरचना को सामने लाती है। परिसीमन सीटों के भूगोल और राजनीतिक संतुलन को बदल देता है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 1467)


क्या होना चाहिए था?

  1. तत्काल प्रभाव से रोटेशन आधार पर लागू: यदि राजनीतिक दलों की नीयत सचमुच साफ होती, तो मौजूदा 543 लोकसभा सीटों में से ही एक-तिहाई सीटों को लॉटरी या रोटेशन सिस्टम से तुरंत महिलाओं के लिए आरक्षित किया जा सकता था।
  2. संघीय ढांचे की रक्षा: परिसीमन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे किसी भी राज्य को जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए राजनीतिक रूप से नुकसान न उठाना पड़े।
  3. वादे और अमल की पारदर्शिता: जनता को यह साफ बताया जाना चाहिए कि कोई कानून कब से लागू होगा, न कि ऐतिहासिक उपलब्धि का ढिंढोरा पीटकर अमल को एक दशक आगे खिसका दिया जाए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या महिला आरक्षण सचमुच महिलाओं को शक्ति देने के लिए लाया गया था, या इसके पीछे 2029 और 2034 के चुनावी भूगोल को बदलने की कोई बहुत बड़ी बिसात बिछाई गई है?

परिसीमन की इस जटिल राजनीति, उत्तर-दक्षिण के संतुलन और 106वें संविधान संशोधन की अंदरूनी हकीकत को विस्तार से जानने के लिए एन. सिंह की पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ के अध्याय 7 और 8 का अध्ययन अवश्य करें।

इसे तत्काल प्रभाव से लागू नहीं किया गया, बल्कि इसके लिए दो महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ अनिवार्य रखी गयीं—पहले नई जनगणना और बाद में परिसीमन। इन दोनों के कारण यह आरक्षण नहीं रहता, बल्कि लॉन्ग टर्म पॉलिटिकल रिस्ट्रक्चरिंग का संकेत बन जाता है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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