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पूना पैक्ट 1932 — गांधी और अम्बेडकर का वो समझौता जिसने राजनीति बदल दी

एन. सिंह · ·5 मिनट

तारीख थी 24 सितंबर 1932।

पुणे की यरवदा जेल में महात्मा गांधी अनशन पर बैठे थे। उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी और पूरे देश में तनाव का माहौल था। दूसरी तरफ खड़े थे दलितों के महान मसीहा डॉ. भीमराव अम्बेडकर।

उस दिन दोनों महापुरुषों के बीच एक ऐतिहासिक दस्तखत हुआ, जिसे इतिहास में ‘पूना पैक्ट’ (Poona Pact) कहा जाता है।

कक्षा आठ की इतिहास की किताबों में अक्सर इसे एक छोटी सी घटना के रूप में पढ़ाकर छोड़ दिया जाता है कि “गांधी और अम्बेडकर के बीच समझौता हो गया और दलितों को सीटें मिल गईं।” लेकिन लेखक एन. सिंह हमें बताते हैं कि उस समझौते की छाया आज 94 साल बाद भी भारत की संसद, विधानसभाओं और राजनीति पर किस तरह हावी है।


अलग निर्वाचन (Separate Electorate) बनाम संयुक्त निर्वाचन

उस ऐतिहासिक विवाद की जड़ को एक सरल उदाहरण से समझिए।

अंग्रेज़ सरकार ने 1932 में ‘कम्युनल अवार्ड’ के तहत दलितों (डिप्रेस्ड क्लासेज) को ‘अलग निर्वाचन क्षेत्र’ का अधिकार दिया था। इसका मतलब यह था कि:

  • उस सीट पर केवल दलित उम्मीदवार खड़ा होगा।
  • और उसे केवल दलित मतदाता ही वोट देकर चुनेंगे!

डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि जब केवल दलित ही अपने नेता को चुनेंगे, तो वह नेता किसी सवर्ण या बड़ी पार्टी का गुलाम नहीं होगा। वह संसद में जाकर अपने समाज के हक के लिए खुलकर दहाड़ सकेगा।

लेकिन महात्मा गांधी इसके सख्त खिलाफ थे। गांधी जी का कहना था कि अगर हिंदू समाज के भीतर दलितों को हमेशा के लिए एक अलग चुनावी वर्ग बना दिया गया, तो हिंदू समाज हमेशा के लिए टूट जाएगा और छुआछूत कभी खत्म नहीं होगी। गांधी जी ने इसके विरोध में जेल में ‘आमरण अनशन’ शुरू कर दिया।

देश में गांधी जी के प्राणों पर संकट देखकर बाबासाहेब अम्बेडकर पर भारी नैतिक दबाव पड़ा। भारी मन से उन्होंने समझौता स्वीकार किया।

समझौते में क्या तय हुआ? दलितों को अलग निर्वाचन क्षेत्र नहीं मिला, बल्कि सामान्य सीटों के भीतर ही उनके लिए सीटें आरक्षित (Reserved) कर दी गईं। यानी उम्मीदवार दलित होगा, लेकिन वोट हर जाति का नागरिक देगा।


समझौते का कड़वा नतीजा: आज के आरक्षित सांसदों की बेबसी

अब ज़रा आज की संसद और विधानसभाओं को देखिए।

लोकसभा में 84 सीटें अनुसूचित जातियों (SC) के लिए और 47 सीटें अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षित हैं। यानी 131 सांसद इन वर्गों से आते हैं!

लेकिन क्या कभी आपने किसी आरक्षित सीट के सांसद को अपनी ही पार्टी के खिलाफ जाकर यह कहते सुना है कि—“मेरे क्षेत्र के दलितों पर अत्याचार हो रहा है, मैं अपनी सरकार का विरोध करता हूँ?”

कभी नहीं! वे संसद में अपनी पार्टी के ‘व्हिप’ (आदेश) के आगे हाथ जोड़े बैठे रहते हैं। क्यों?

क्योंकि वे जानते हैं कि वे केवल दलितों के वोटों से नहीं जीते हैं। उन्हें जीतने के लिए पार्टी के चुनाव चिन्ह, पार्टी के पैसे और सभी जातियों के वोटों की ज़रूरत है। यदि उन्होंने पार्टी हाईकमान के खिलाफ ज़रा भी आवाज़ उठाई, तो अगली बार पार्टी उनका टिकट काट देगी!

इस तरह, पूना पैक्ट ने दलित समाज को ‘संख्या’ (सीटें) तो दीं, लेकिन उनकी ‘असली स्वतंत्र आवाज़’ छीन ली!


किताब से कड़वा सच

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के तीसरे अध्याय में पूना पैक्ट के इस ऐतिहासिक अंतर्द्वंद्व का विश्लेषण करते हुए लिखते हैं:

“सन् 1932 का पूना पैक्ट भारतीय इतिहास की उन घटनाओं में से एक है, जिसे अक्सर संक्षेप में पढ़ाया जाता है, जाना जाता है; लेकिन इसके प्रभाव बहुत गहरे और दीर्घकालिक हैं। वर्तमान राजनीति में बहुजन राजनीतिक आंदोलन इसी पर आधारित है, जो अब एक स्वार्थ की राजनीति बन गई है, जो भारत को विखंडन की ओर ढकेल रही है… पूर्व में पूना पैक्ट केवल राजनीतिक समझौता नहीं था, बल्कि यह दो अलग-अलग दृष्टिकोणों के बीच का संघर्ष था—सामाजिक न्याय बनाम सामाजिक एकता।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 953 व 959)

वे आगे सवाल उठाते हैं:

“पूना पैक्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि सामाजिक न्याय का प्रश्न केवल नैतिक या सामाजिक नहीं है—यह गहराई से राजनीतिक भी है। आज भी जब हम जातीय जनगणना और प्रतिनिधित्व की बात करते हैं, तो कहीं न कहीं पूना पैक्ट की छाया दिखाई देती है। क्या हम केवल प्रतिनिधित्व से संतुष्ट हैं या हम वास्तविक सशक्तिकरण चाहते हैं? यह सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 1932 में था।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 975 व 981)


आज क्या सुधार होना चाहिए?

  1. प्रतिनिधियों की आंतरिक स्वतंत्रता: आरक्षित सीटों से चुने जाने वाले सांसदों और विधायकों को दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) के उस कठोर शिकंजे से कुछ मामलों में छूट मिलनी चाहिए, ताकि वे अपने समाज पर होने वाले अत्याचारों पर संसद में बिना डरे बोल सकें।
  2. दलित राजनीति का आत्ममंथन: बहुजन समाज के युवाओं को यह पूछना होगा कि जो नेता बाबासाहेब की तस्वीर लगाकर सत्ता में आते हैं, वे सत्ता में पहुँचने के बाद पूना पैक्ट के मूक दर्शक क्यों बन जाते हैं?
  3. सच्चा सामाजिक बंधुत्व: गांधी जी का सपना तभी पूरा होगा जब सवर्ण समाज अपने दिलों से ऊंच-नीच का भाव पूरी तरह मिटाए और अम्बेडकर जी का सपना तभी पूरा होगा जब वंचित समाज को सत्ता में असली और स्वतंत्र भागीदारी मिले।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या आज की आरक्षित सीटें सचमुच शोषितों की आवाज़ बन रही हैं, या वे केवल राजनीतिक दलों के बंधुआ वोट बैंक का साधन हैं?

गांधी, अम्बेडकर, पूना पैक्ट की अंदरूनी बहसों और भारतीय प्रतिनिधित्व के इस 90 साल पुराने अनकहे सच को जानने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का तीसरा अध्याय अवश्य पढ़ें।

सन् 1932 का पूना पैक्ट भारतीय इतिहास की उन घटनाओं में से एक है, जिसे अक्सर संक्षेप में पढ़ाया जाता है, जाना जाता है; लेकिन इसके प्रभाव बहुत गहरे और दीर्घकालिक हैं। वर्तमान राजनीति में बहुजन राजनीतिक आंदोलन इसी पर आधारित है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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