'प्रधानपति' से लेकर 'सांसदपति' तक — क्या महिला आरक्षण से असली औरत को ताकत मिलेगी?
एन. सिंह · ·4 मिनट
अगर आप उत्तर भारत के किसी भी गाँव में चले जाएं और पूछें कि “यहाँ के प्रधान जी कौन हैं?” तो एक सज्जन कुर्ता-पायजामा पहने चले आएंगे और कहेंगे—“हम ही प्रधान हैं!”
लेकिन जब आप सरकारी कागज़ात देखेंगे, तो प्रधान के पद पर उनकी पत्नी का नाम लिखा होगा!
गाँव के थाने की बैठक हो, तहसील दिवस हो या ब्लॉक का कोई काम—हर जगह पति महोदय ही जाते हैं। यहाँ तक कि सरकारी गाड़ी पर भी बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है: ‘प्रधानपति’! असली महिला प्रधान घर के अंदर चूल्हा जलाती रहती है, घूंघट काढ़ती है और जब कोई कागज़ आता है, तो पतिदेव उस पर उसका अंगूठा लगवा लेते हैं।
अब एक बड़ा सवाल पूरे देश के सामने है: जब संसद और विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण लागू होगा, तो क्या वहाँ भी यही खेल नहीं चलेगा? क्या ‘प्रधानपति’ का यह मॉडल अब ‘सांसदपति’ और ‘विधायकपति’ बनकर दिल्ली और राजधानियों में नहीं बैठेगा?
30 साल का पंचायती प्रयोग: क्या सीखा हमने?
1992-93 में जब 73वां और 74वां संविधान संशोधन हुआ था, तो स्थानीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण दिया गया था। आज भारत में 14 लाख से अधिक महिला पंचायत प्रतिनिधि हैं। कागज़ पर यह दुनिया का सबसे बड़ा महिला प्रतिनिधित्व का रिकॉर्ड है।
लेकिन ज़मीन पर सच्चाई क्या है?
इन 14 लाख महिलाओं में से 90% महिलाएं केवल ‘मुखौटा’ (प्रॉक्सी) बनकर रह गई हैं। फैसले उनके ससुर, पति या बेटे लेते हैं।
अब देश की संसद ने 106वां संविधान संशोधन (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) पारित किया है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। टीवी पर खूब जश्न मनाया गया कि “नारी शक्ति की जीत हो गई।” लेकिन लेखक एन. सिंह पूछते हैं कि टिकट किसे मिलेगा?
हर राजनीतिक दल के बड़े-बड़े बाहुबली, करोड़पति नेता और मंत्री अपनी पत्नियों, बहुओं और बेटियों को चुनाव मैदान में उतार देंगे। पोस्टर पर महिला की तस्वीर होगी, लेकिन चुनाव का पैसा, रणनीति और जीतने के बाद मंत्रालय का सारा काम वही पुराने पुरुष चलाएंगे।
किताब से कड़वा सच
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के सातवें अध्याय में इस ‘प्रॉक्सी सत्ता’ की परतें उधेड़ते हुए लिखते हैं:
“अब जरा ध्यान देने की जरूरत है- जो खेल गाँव में चल रहा है, वही खेल यदि संसद में चला तो क्या बदलेगा ? कुछ भी नहीं। फर्क इतना होगा कि गाँवों के प्रधानपति की जगह सांसदपति आ जायेंगे। आवाज किसी और की होगी, दिमाग किसी और का। बड़े लोग अपनी पत्नी को टिकट देंगे। अपनी बेटी को आगे करेंगे और खुद पीछे से सत्ता चलायेंगे। यानी महिला आरक्षण असली औरत को नहीं- सत्ता के पुराने मालिकों को नया रास्ता देगा। यह सिर्फ अमीरों का खेल नहीं, हर समाज में यही सच है, चाहे वह अगड़ा हो, ओबीसी हो, एससी/एसटी हो… यह लड़ाई जाति की नहीं है, ताकत की है। सत्य की नहीं है, पावर की है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 1439)
वे आगे दो-टूक कहते हैं:
“सच जो कड़वा है, लेकिन जरूरी है। महिला आरक्षण मौका दे सकता है, लेकिन ताकत नहीं दे सकता। अगर समाज नहीं बदला तो यह आरक्षण प्रॉक्सी सत्ता का सबसे बड़ा औजार बन जाएगा, जो अभी तक पंचायत चुनावों में देखने को मिल रहा है… जब तक घर की औरत अपने जीवन का फैसला खुद नहीं लेगी, तब तक पंचायत क्या, संसद में बैठी औरत भी किसी और की प्रॉक्सी ही रहेगी। यह लड़ाई सीट की नहीं, असली ताकत की है और यह ताकत अभी भी औरतों के पास नहीं है।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 1465)
असली ताकत कैसे मिले?
- ‘प्रधानपति’ और ‘सांसदपति’ संस्कृति पर कानूनी रोक: यदि किसी निर्वाचित महिला के स्थान पर उसका पति या पुरुष रिश्तेदार सरकारी बैठकों या फैसलों में दखल दे, तो उसकी सदस्यता तुरंत रद्द करने का कड़ा कानून बने।
- ज़मीनी महिला कार्यकर्ताओं को अवसर: राजनीतिक दल केवल अपने बड़े नेताओं के परिवारों की महिलाओं को टिकट बांटने के बजाय गाँव और मोहल्ले के स्तर पर संघर्ष करने वाली सामान्य कार्यकर्ताओं को आगे लाएं।
- शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता: जब तक एक आम महिला खुद अपने बैंक खाते, अपनी संपत्ति और अपनी शिक्षा के फैसले खुद नहीं ले सकती, तब तक राजनीतिक आरक्षण केवल एक खोखला ढोल बना रहेगा।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या महिला आरक्षण से गाँव की ईंट ढोने वाली, खेत जोतने वाली और चूल्हा फूंकने वाली सामान्य औरत कभी संसद की चौखट लांघ पाएगी?
भारतीय राजनीति में परिवारवाद, प्रॉक्सी सत्ता और महिला आरक्षण के इस गंभीर संकट का सबसे सटीक और बेबाक विश्लेषण पढ़ने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का सातवां अध्याय अवश्य पढ़ें।
अब जरा ध्यान देने की जरूरत है- जो खेल गाँव में चल रहा है, वही खेल यदि संसद में चला तो क्या बदलेगा ? कुछ भी नहीं। फर्क इतना होगा कि गाँवों के प्रधानपति की जगह सांसदपति आ जायेंगे। आवाज किसी और की होगी, दिमाग किसी और का।