एन. सिंह का क्रांतिकारी फॉर्मूला: आरक्षण सिर्फ सरकारी प्राइमरी स्कूल के बच्चों को क्यों मिले?
एन. सिंह · ·5 मिनट
ज़रा एक तस्वीर की कल्पना कीजिए।
एक तरफ एक आलीशान निजी स्कूल है। स्कूल की बसें वातानुकूलित (AC) हैं, क्लासरूम में स्मार्ट बोर्ड लगे हैं, स्विमिंग पूल है और शिक्षक फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करते हैं। वहाँ पढ़ने वाले एक बच्चे के माता-पिता बड़े अधिकारी या रईस व्यापारी हैं और वे उसकी पढ़ाई पर हर महीने पचास हज़ार रुपये खर्च करते हैं।
अब दूसरी तरफ उसी शहर से 20 किलोमीटर दूर एक गाँव के सरकारी प्राइमरी स्कूल को देखिए।
वहाँ छत से बारिश का पानी टपक रहा है। बच्चे फटी हुई टाट-पट्टी (बोरी) पर ज़मीन पर बैठे हैं। बिजली नहीं है, इसलिए गर्मी में पसीने से तर-बतर हैं। दो-दो क्लासों को मिलाकर एक अकेला मास्टर जी जैसे-तैसे पढ़ा रहे हैं। वहाँ पढ़ने वाले बच्चे के पास न अच्छे जूते हैं, न पेंसिल-रबर; वह दोपहर के मिड-डे मील की खिचड़ी के इंतज़ार में स्कूल आता है।
अब आप बताइए: अगर जाति के आधार पर उन दोनों बच्चों को एक ही कोटे में बिठा दिया जाए, तो क्या सरकारी प्राइमरी स्कूल का वह गरीब बच्चा उस बड़े कॉन्वेंट वाले बच्चे से कभी मुकाबला कर पाएगा?
कदापि नहीं! यही वह सवाल है जिस पर भारत का कोई भी बड़ा नेता मुँह खोलने की हिम्मत नहीं करता।
समस्या की असली जड़: शिक्षा का दोहरा ढांचा
हमारे देश में आज़ादी के बाद से दो तरह का भारत बन गया है:
- एक भारत रईसों का है, जिनके बच्चे नर्सरी से लेकर 12वीं तक महँगे प्राइवेट स्कूलों और फिर विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं।
- दूसरा भारत उन 80% गरीबों का है, जिनके पास सरकारी प्राइमरी स्कूल के अलावा पढ़ाई का कोई दूसरा साधन नहीं है।
जब सरकारी नौकरियों या मेडिकल-इंजीनियरिंग की प्रतियोगी परीक्षाएं होती हैं, तो प्राइवेट स्कूलों में पढ़े हुए संपन्न परिवारों के बच्चे जाति का प्रमाण पत्र लगाकर आरक्षित सीटों पर आसानी से कब्ज़ा कर लेते हैं। और वह गरीब बच्चा, जिसके नाम पर यह पूरी व्यवस्था बनाई गई थी, वह ज़िंदगी भर खेतों में मज़दूरी या शहरों में रिक्शा चलाने के लिए अभिशप्त रह जाता है।
लेखक का क्रांतिकारी समाधान: प्राइमरी स्कूल आधारित आरक्षण
लेखक एन. सिंह अपनी मौलिक पुस्तक ‘अनोखा भारत’ में इस पाखंड का ऐसा तोड़ प्रस्तुत करते हैं, जो भारत की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था की कायापलट कर सकता है।
वे कहते हैं: “जाति के नाम पर चल रहे सारे ढकोसले को खत्म कर दो! अगर आरक्षण देना ही है, तो सिर्फ और सिर्फ उन बच्चों को दो जिन्होंने अपनी पहली से आठवीं तक की पढ़ाई सरकारी प्राइमरी स्कूल या जूनियर हाईस्कूल से पूरी की है!”
ज़रा सोचिए, अगर यह नियम लागू हो जाए, तो क्या होगा?
- जातिवाद का खात्मा: आरक्षण पाने के लिए किसी जाति का सर्टिफिकेट नहीं, बल्कि सरकारी प्राइमरी स्कूल की मार्कशीट चाहिए होगी। इससे अमीर-गरीब का भेद मिटेगा।
- सरकारी स्कूलों की कायापलट: जब नेताओं, आईएएस अफसरों, जजों और धन्नासेठों को पता चलेगा कि उनके बच्चों को सरकारी नौकरी या आरक्षण तभी मिल सकता है जब वे सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़ेंगे—तो वे रातों-रात सरकारी स्कूलों की इमारतें, पंखे, कंप्यूटर और पढ़ाई का स्तर फाइव-स्टार जैसा बना देंगे!
- असली गरीब को न्याय: गाँव के जिस मजदूर या किसान के बच्चे ने कभी शहर का मुँह नहीं देखा, वही बच्चा देश की सबसे बड़ी कुर्सियों पर बैठकर देश चलाएगा।
किताब से मूल उद्धरण
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के आरंभ में ही यह साहसिक उद्घोष करते हैं:
“लेखक के स्वयं का विचार - वर्तमान भारत में अवसरवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत, जातीय जनगणना मात्र एक छलावा है, वोट बाज़ीगरी का साधन है। शिकारी का लक्ष्य महज सत्ता प्राप्त करना है न कि दरिद्र, दुबले-कुचले को खुशहाल बनाना एवं राष्ट्रीय एकता को कायम रखना। ‘जातीय जनगणना’ भारत विखण्डन का नींव है। अब समय आ गया है कि किसी भी योजना का लाभ सरकारी प्राइमरी स्कूल या जूनियर हाईस्कूल में नामांकित बालकों को ही आरक्षण मिलना चाहिए, क्योंकि ये वही दरिद्र हैं जो कभी शहर का मुँह तक नहीं देखे तथा आजादी के 78 वर्ष बाद का विकसित भारत कैसा है, उनको अपनी आँखों से दिखाई नहीं पड़ा। सभी प्रकार के आरक्षण को समाप्त कर देना चाहिए और केवल प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को ही आरक्षण एवं योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए।”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 5)
वे आगे लिखते हैं:
“सरकार क्यों नहीं यह तय कर देती कि सरकारी नौकरी के लिए आवश्यक शर्त, सरकारी स्कूल में पढ़ाना भी होगा? तब देखें कितने लोग इस कार्य में आगे रहते हैं। व्यापारियों के लड़के तो कभी सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते… क्या यही है ‘सबका साथ’ ? अयोग्य होते हुए भी डिग्री देकर यही है ‘सबका विकास’ ?”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 6348)
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या आज का कोई भी राजनीतिक दल इस ईमानदार फॉर्मूले को लागू करने का साहस जुटा सकता है? या वे जनता को जातियों के झगड़े में उलझाकर अपने निजी स्वार्थ की रोटियां ही सेकते रहेंगे?
भारत के शिक्षा तंत्र, आरक्षण की नई दिशा और राष्ट्र निर्माण के इस सबसे मौलिक विज़न को गहराई से समझने के लिए विमला सिंह और एन. सिंह की क्रांतिकारी पुस्तक ‘अनोखा भारत: भारत का अवसरवादी लोकतंत्र, विनाशकारी घटकों का उदय’ का अध्ययन हर देशभक्त नागरिक को ज़रूर करना चाहिए।
अब समय आ गया है कि किसी भी योजना का लाभ सरकारी प्राइमरी स्कूल या जूनियर हाईस्कूल में नामांकित बालकों को ही आरक्षण मिलना चाहिए, क्योंकि ये वही दरिद्र हैं जो कभी शहर का मुँह तक नहीं देखे तथा आजादी के 78 वर्ष बाद का विकसित भारत कैसा है, उनको अपनी आँखों से दिखाई नहीं पड़ा।