आरक्षण के भीतर आरक्षण — क्या इससे ईंट ढोने और खेत जोतने वाली औरत का भला होगा?
एन. सिंह · ·4 मिनट
जब संसद में महिला आरक्षण बिल पेश हुआ, तो कई राजनीतिक दलों ने एक बहुत ज़ोरदार मांग उठाई। उन्होंने कहा—“इस 33% महिला आरक्षण के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग से कोटा होना चाहिए। इसे ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ (Quota within Quota) कहा गया।”
पहली नज़र में किसी भी आठवीं के बच्चे को यह बात बहुत सही और इंसाफ़ भरी लगेगी। बच्चा सोचेगा—“हाँ भाई! जब समाज में पिछड़ी और दलित महिलाएं ज़्यादा हैं और वे गरीब हैं, तो उन्हें अलग से सीट मिलनी ही चाहिए।”
लेकिन अब ज़रा राजनीति की उस अंदरूनी सच्चाई को देखिए जो भाषणों में कभी नहीं बताई जाती।
मान लीजिए ओबीसी कोटे के तहत किसी जिले की लोकसभा सीट आरक्षित हो गई। अब उस सीट पर चुनाव लड़ने के लिए टिकट किसे मिलेगा?
- क्या उस ओबीसी महिला को मिलेगा जो धूप में पसीना बहाकर दूसरों के खेतों में धान रोपती है?
- क्या उस बुनकर या कुम्हार समाज की गरीब औरत को मिलेगा जिसके घर में कच्ची छत है?
बिल्कुल नहीं! टिकट मिलेगा उस इलाके के किसी बड़े ओबीसी बाहुबली, मिल मालिक या ठेकेदार की पत्नी, बेटी या भाभी को!
हर समाज का एक ही सच: ऊपर वालों का कब्ज़ा
हम अक्सर यह सोचते हैं कि शोषण केवल अगड़े और पिछड़े के बीच होता है। लेकिन लेखक एन. सिंह समाज के उस छिपे हुए सच को उजागर करते हैं जिसे सब जानते हुए भी अनदेखा करते हैं: हर जाति और हर समाज के भीतर एक ‘दबंग और पैसे वाला वर्ग’ मौजूद है।
चाहे सवर्ण समाज हो, ओबीसी समाज हो, या एससी-एसटी समाज—हर जाति में 5-10% लोग ऐसे हैं जिनके पास भारी ज़मीन, पैसा, गाड़ियां और पुलिस-प्रशासन तक गहरी पहुंच है।
जब नौकरियों में महिलाओं के लिए आरक्षण की बात आती है, तो बड़े शहरों के वातानुकूलित हॉस्टलों में रहकर लाखों रुपये की कोचिंग करने वाली संपन्न परिवारों की लड़कियां ही उन पदों को हासिल करती हैं। गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली उस गरीब लड़की को तो यह पता भी नहीं चल पाता कि फॉर्म कब आया और कब भर गया!
किताब से कड़वा सच
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के सातवें अध्याय में इस जमीनी हकीकत पर कठोर प्रहार करते हुए लिखते हैं:
“आरक्षण में आरक्षण एक और परत, लेकिन खेल वही, अब एक नई बात चल रही है। महिला आरक्षण के अंदर भी आरक्षण। जैसे ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा। सुनने में तो अच्छा लगता है, न्याय की बात लगती है, लेकिन जमीनी सच्चाई क्या है ? अगर यह लागू हुआ, तो ओबीसी के दबंग अपने घर की औरतों को भेजेंगे। दलित समाज के दबंग अपने घर की औरतों को भेजेंगे। हर समाज का ऊपरवाला हिस्सा ही फायदा लेगा, नीचे वाली औरत वही ईंट ढोती रहेगी, वही चूल्हा जलाती रहेगी, वही हिंसा झेलती रहेगी। यानी आरक्षण में आरक्षण भी प्रॉक्सी राजनीति का जाल बन सकता है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 1441 व 1447)
वे आगे सवाल करते हैं:
“ये वैसे ही है, जैसे कि आजकल नौकरियों में महिलाओं के आरक्षण का हो रहा है। सब ऊपर वर्ग की औरतें ही कोचिंग कर रही हैं, बड़े शहरों में रहकर, क्योंकि पैसे हैं, ताकत है… क्या यह आरक्षण ईंट ढोने वाली, खेत में काम करने वाली, घर में खाना बनाने वाली, शहर में कूड़ा बीनने वाली औरतों के लिए है क्या ? उत्तर होगा- ‘नहीं’। वह चुनाव कैसे लड़ेगी ? इसीलिए महिला आरक्षण का लाभ सबसे पहले उसी को मिलना चाहिए था - लेकिन वही सबसे दूर है।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 1447 व 1459)
असली समाधान की दिशा
- आर्थिक वंचना को प्राथमिकता: चाहे सामान्य महिला आरक्षण हो या कोटे के भीतर कोटा, चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के लिए यह बाध्यकारी होना चाहिए कि वे उन महिलाओं को टिकट दें जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि विशुद्ध रूप से श्रमिक या किसान की हो।
- चुनावी खर्च पर सख्त लगाम: जब तक एक चुनाव लड़ने में 10 से 20 करोड़ रुपये का काला धन खर्च होता रहेगा, तब तक कोई भी आम या गरीब महिला चुनाव लड़ने का सपना भी नहीं देख सकती।
- शिक्षा और जागरूकता की क्रांति: गाँव-गाँव की महिलाओं को उनके कानूनी और संवैधानिक अधिकारों की शिक्षा दी जाए ताकि वे अपने घर के पुरुषों की ‘रबर स्टैम्प’ बनने से इंकार कर सकें।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या महिला आरक्षण सिर्फ कुछ राजनीतिक परिवारों की बेटियों और बहुओं के संसद में आने का नया चोर दरवाज़ा बनकर रह जाएगा?
जाति, वर्ग और महिला राजनीति के इस गहरे चक्रव्यूह को समझने और सामाजिक न्याय की वास्तविक परिभाषा को जानने के लिए एन. सिंह की किताब ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का सातवां अध्याय ज़रूर पढ़ें।
अगर यह लागू हुआ, तो ओबीसी के दबंग अपने घर की औरतों को भेजेंगे। दलित समाज के दबंग अपने घर की औरतों को भेजेंगे। हर समाज का ऊपरवाला हिस्सा ही फायदा लेगा, नीचे वाली औरत वही ईंट ढोती रहेगी, वही चूल्हा जलाती रहेगी, वही हिंसा झेलती रहेगी।