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5 सितारा होटलों में रिसॉर्ट-पॉलिटिक्स — जनता वोट देती है, नेता बिक जाते हैं

एन. सिंह · ·5 मिनट

चुनाव के दिन की एक तस्वीर याद कीजिए।

कड़कड़ाती धूप में एक 70 साल का बूढ़ा किसान लाठी टेकते हुए पोलिंग बूथ पर पहुँचता है। वह दो घंटे लाइन में खड़ा रहता है। उसकी उंगली पर नीली स्याही लगती है। वह सोचता है—“मैंने जिसे वोट दिया है, वह जीतने के बाद हमारे गाँव की सड़क बनवाएगा और मेरे पोते के लिए गाँव में एक अस्पताल खुलवाएगा।”

अब चुनाव के ठीक तीन दिन बाद की दूसरी तस्वीर टीवी पर देखिए।

वही चुना हुआ विधायक किसी चार्टर्ड प्लेन में बैठकर गोवा, सूरत या जयपुर के 5-स्टार लग्जरी रिसॉर्ट में उतरता है। वहाँ स्विमिंग पूल के किनारे वह महंगे चश्मे लगाए, हाथ में कोल्ड ड्रिंक लिए, ताश के पत्ते खेलता हुआ दिखता है। बाहर हथियारबंद बाउंसर खड़े हैं ताकि कोई उसे छू न सके।

समाचार एंकर चिल्लाता है—“विधायकों की बाड़ाबंदी! एक-एक विधायक की बोली 25 करोड़ से 50 करोड़ रुपये लगी है!”

अब आप बताइए: उस गरीब किसान के पवित्र वोट की कीमत क्या सिर्फ यह थी कि उसका चुना हुआ नेता किसी फाइव-स्टार होटल में करोड़ों रुपये में नीलाम हो जाए?


लोकतंत्र जब ‘व्यापार’ बन जाए

हमारे संविधान में लोकतंत्र का मतलब था: “जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन।” लेकिन 21वीं सदी के भारत में यह बदलकर रह गया है: “पूंजीपतियों का, बाहुबलियों के लिए और दलालों द्वारा शासन!”

आज राजनीति देश सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि बिना किसी टैक्स के सबसे ज़्यादा मुनाफा देने वाला ‘कॉरपोरेट धंधा’ बन चुकी है।

  1. टिकटों की नीलामी: चुनाव लड़ने से पहले ही पार्टियां करोड़ों रुपयों में टिकट बेचती हैं। जो व्यक्ति 10 करोड़ रुपये खर्च करके विधायक बनेगा, वह जीतने के बाद सबसे पहले अपने 50 करोड़ रुपये वसूलने की जुगत भिड़ाएगा।
  2. दल-बदल का मज़ाक: जनता जिस पार्टी की नीतियों पर भरोसा करके वोट देती है, चुनाव परिणाम आते ही वही विधायक पाला बदलकर विरोधी पार्टी की गोद में जाकर बैठ जाता है।
  3. अपराधियों का महिमामंडन: जिन लोगों पर हत्या, डकैती, ज़मीन हड़पने और दंगा भड़काने के संगीन मुकदमे दर्ज हैं, वे मंत्री बनकर पुलिस और कानून को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं।

किताब से कड़वा सच

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के 15वें और 20वें अध्याय में इस सड़ती हुई व्यवस्था का नंगा सच सामने लाते हुए लिखते हैं:

“सत्ता में रहना इतना फायदेमंद है कि भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति राजनेताओं में बढ़ती जा रही है। बहुमत बनाये रखने और संख्याबल जुटाये रखने के लिए विधायकों की खरीदफरोख्त ऊँची दरों पर की जा रही हैं। गठबंधन और अल्पमत सरकारों के इस युग में यह धंधा खूब फल-फूल रहा है। विधायक अक्सर पाला बदलते हैं, पार्टियों की अदला-बदली करते रहते हैं। ये सब बातें इतनी सामान्य हो गयी हैं कि किसी ख़ास दल के नेताओं को तोड़ने के लिए या तोड़कर थोक के भाव में गोवा, सूरत, बर्लिन या किसी बड़े रिसॉट्स जैसी जगहों पर ले जाया जाता है। यहाँ भी झुण्ड में ले जाए जाते हैं। इनकी संख्या 50 तक होती है। उन्हें शानदार होटलों में रखा जाता है। माननीय लोग पत्ते खेलते हैं, मौज मस्ती करते हैं… राजनीति इतना अच्छा व्यवसाय है कि यह एक गंदे कारोबार में भी बदल गया है।”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 4407)

नेताओं की बदलती जीवनशैली पर वे आगे कटाक्ष करते हैं:

“अपनी सादगी और सरलता के लिए मशहूर नेता अब बड़े-बड़े मकानों में रहने लगे। लम्बी आलिशान गाड़ियों में यात्रा करते, पंचसितारा होटलों में खाना खाने लगे। वाकई वे नये महाराजाओं के अवतार में आ गये। राजनीतिक जीवन से धोती गायब हो चुकी थी। छड़ी, लकड़ी के खड़ाऊँ, रेलवे के तीसरे दर्जें में सफ़र खत्म हो चुका था। महँगे जूते, महँगे चश्मे, बुलेटप्रूफ जैकेट, मर्सिडीज गाड़ियाँ, सरकारी हेलीकॉप्टरों ने इनकी जगह ले ली। भारतीय राजनीति से पसीनों की गंध दूर हो चुकी थी। अब उसमें आफ्टरशेव की खुशबू आ रही थी।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 2393)


इस गंदे खेल को कैसे खत्म करें?

  1. सख्त दल-बदल कानून (Zero Tolerance): यदि कोई विधायक या सांसद अपनी मूल पार्टी छोड़ता है या सरकार गिराने में व्हिप का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता तुरंत प्रभाव से समाप्त हो और उस पर 6 वर्ष तक किसी भी चुनाव में भाग लेने पर पूर्ण प्रतिबंध लगे।
  2. राइट टू रिकॉल (Right to Recall): जनता को यह कानूनी अधिकार मिलना चाहिए कि यदि उसका चुना हुआ प्रतिनिधि भ्रष्ट निकलता है या बिक जाता है, तो जनता हस्ताक्षर अभियान चलाकर उसे पद से वापस बुला सके।
  3. अपराधियों का पूर्ण बहिष्कार: जिस व्यक्ति पर अदालत द्वारा गंभीर अपराधों में आरोप तय (Charge framed) हो चुके हों, उसे किसी भी चुनाव में पर्चा दाखिल करने की अनुमति न मिले।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या हम इसी तरह चुपचाप तमाशा देखते रहेंगे और अपने वोटों को नेताओं की तिजोरियां भरने का ज़रिया बनने देंगे?

भारतीय लोकतंत्र के इस अवसरवादी चेहरे, रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के अंदरूनी षड्यंत्रों और चुनावी सुधारों की बेबाक पड़ताल के लिए विमला सिंह और एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का 15वां और 20वां अध्याय ज़रूर पढ़ें।

बहुमत बनाये रखने और संख्याबल जुटाये रखने के लिए विधायकों की खरीदफरोख्त ऊँची दरों पर की जा रही हैं... उन्हें शानदार होटलों में रखा जाता है। माननीय लोग पत्ते खेलते हैं, मौज मस्ती करते हैं... राजनीति इतना अच्छा व्यवसाय है कि यह एक गंदे कारोबार में भी बदल गया है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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