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क्या हम समाज को समझने के लिए गिन रहे हैं या बाँटने के लिए?

एन. सिंह · ·5 मिनट

मान लीजिए आपके स्कूल की आठवीं कक्षा में 50 बच्चे पढ़ते हैं। एक दिन नए मास्टर जी क्लास में आते हैं और सभी बच्चों की एक सूची बनाते हैं। वे देखते हैं कि किन बच्चों के पास कॉपी-किताबें नहीं हैं, किनके पास पेंसिल-रबर नहीं है, और कौन से बच्चे दोपहर का खाना घर से नहीं ला पाते। इसके बाद मास्टर जी उन जरूरतमंद बच्चों के लिए किताबों और खाने का इंतज़ाम करते हैं। ऐसी गिनती को हर कोई अच्छा कहेगा, क्योंकि इसका मकसद मदद करना और सबको साथ लेकर चलना है।

लेकिन अब ज़रा दूसरी तस्वीर देखिए।

मान लीजिए क्लास का कोई चालाक बच्चा यह देखने के लिए गिनती शुरू करे कि कौन सा बच्चा किस मोहल्ले का है, कौन किस जाति का है, और फिर वह एक मोहल्ले के बच्चों को दूसरे मोहल्ले के बच्चों से लड़ा दे ताकि अगली बार वही क्लास का मॉनिटर बन जाए। क्या आप ऐसी गिनती को सही कहेंगे?

आज हमारे देश भारत में ठीक यही सवाल सबसे बड़ा बन चुका है: क्या जातियों की गिनती समाज को समझने और कमजोरों की मदद के लिए हो रही है, या फिर यह चुनाव जीतने और समाज को बाँटने का नया हथियार है?


गिनती का गणित और सियासत की नीयत

हमारे देश को आज़ाद हुए 78 साल से ज़्यादा हो चुके हैं। जब देश आज़ाद हुआ था, तो संविधान सभा में बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर और पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने सपना देखा था कि आज़ादी के बाद जाति-पाति का भेद धीरे-धीरे मिट जाएगा और हम सब सिर्फ ‘भारतीय’ कहलाएंगे। लेकिन आज हकीकत क्या है?

आज जब भी चुनाव आते हैं, तो टीवी चैनलों से लेकर गाँव की चौपाल तक केवल एक ही चर्चा होती है—किस सीट पर किस जाति के कितने वोटर हैं। नेताजी जनता के बीच जाकर यह नहीं पूछते कि आपके गाँव के प्राथमिक स्कूल में मास्टर जी रोज़ आते हैं या नहीं, अस्पताल में दवाइयां मिलती हैं या नहीं, या खेत की सिंचाई के लिए नहर में पानी आया या नहीं। वे केवल यह गणित लगाते हैं कि अमुक जाति के वोट कैसे बटोरे जाएं।

गिनती (डेटा) अपने आप में कोई बुरी चीज़ नहीं है। विज्ञान हो या सरकार, बिना आंकड़ों के कोई भी योजना नहीं बनाई जा सकती। लेकिन फर्क इस बात से पड़ता है कि उस गिनती के पीछे नीयत क्या है?

यदि गिनती का उपयोग यह जानने के लिए किया जाए कि किस बस्ती में पीने का साफ पानी नहीं पहुँचा, किस परिवार के बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, और उन्हें सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ दिया जाए—तो यह सामाजिक न्याय है। लेकिन जब सत्ता में बैठे लोग या विपक्ष के नेता केवल अपनी कुर्सी बचाने के लिए जातियों के सिर गिनने लगें, तो वह न्याय नहीं बल्कि समाज के ताने-बाने को तार-तार करना है।


किताब से कड़वा सच

लेखक एन. सिंह अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ में इस दोमुंहेपन पर सीधा प्रहार करते हुए लिखते हैं:

“यहीं से इस पुस्तक का मूल प्रश्न जन्म लेता है— क्या हम समाज को समझने के लिए गिनती कर रहे हैं या समाज को बाँटने के लिए? यह प्रश्न असुविधाजनक है, परन्तु आवश्यक है। क्योंकि यदि मनुष्य के भीतर स्वार्थ और असुरक्षा का तत्व अभी भी प्रबल है, तो कोई भी व्यवस्था—चाहे वह कितनी ही निष्पक्ष क्यों न प्रतीत हो— उसके माध्यम से विभाजन का साधन बन सकती है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 13)

लेखक आगे एक बहुत बड़ी चेतावनी देते हैं:

“1989 के बाद भारत की अवसरवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता का उद्देश्य सेवा नहीं, बल्कि शोषण बन गया है। अब चालाक सत्ता हर मूर्ख को देशभक्त और हर बुद्धिमान को देशद्रोही बना रही है… सत्ता प्राप्त करने के लिए जातीय जनगणना को कुछ वर्षों तक अंतिम औजार के रूप में प्रयोग करने का प्रयास सत्ताभोगियों का नया हथियार प्रतीत हो रहा है।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 14)


असली समाधान क्या है?

अगर हमें सचमुच भारत को एक मजबूत और विकसित राष्ट्र बनाना है, तो हमें गिनती के इस खेल को समझना होगा:

  1. आंकड़े कल्याण के लिए हों, नफ़रत के लिए नहीं: किसी भी सर्वे या जनगणना का पहला नियम यह होना चाहिए कि उसके आधार पर नीतियां गरीबों के उत्थान की बनें, न कि चुनावी रैलियों में ज़हर घोलने की।
  2. अंतिम व्यक्ति की पहचान: गिनती जातियों के बड़े-बड़े थोक समूहों की न हो, बल्कि उस अंतिम व्यक्ति की हो जो आज भी झोपड़ी में दीया जलाकर सोता है और जिसके पास दो जून की रोटी का जुगाड़ नहीं है।
  3. नागरिक चेतना: जब तक हम और आप वोट देते समय अपनी जाति का चश्मा नहीं उतारेंगे, तब तक नेता हमें सिर्फ एक संख्या (वोट) समझते रहेंगे, इंसान नहीं।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

गिनती से क्या सचमुच सामाजिक न्याय मिल सकता है? या फिर यह सिर्फ सत्ता के उन पुराने खिलाड़ियों की नई चाल है जो हर दस साल में जनता को नए नाम से बाँट देते हैं?

इस गहरे सवाल की जड़ तक पहुँचने, आज़ादी के बाद के चुनावी आंकड़ों को परखने और भारतीय राजनीति के इस अनकहे सच को बेबाकी से समझने के लिए आपको एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का पहला अध्याय ज़रूर पढ़ना चाहिए। यह किताब आपको उत्तर रटाती नहीं, बल्कि सोचने के लिए मजबूर करती है।

यहीं से इस पुस्तक का मूल प्रश्न जन्म लेता है— क्या हम समाज को समझने के लिए गिनती कर रहे हैं या समाज को बाँटने के लिए?

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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