एक साहसिक विचार: चुनाव लड़ने के लिए सेना में 5 साल की सेवा अनिवार्य क्यों हो?
एन. सिंह · ·4 मिनट
ज़रा सोचिए, अगर किसी ऐसे व्यक्ति को ट्रेन का ड्राइवर बना दिया जाए जिसने ज़िंदगी में कभी रेलगाड़ी का इंजन देखा ही न हो, तो क्या होगा? दुर्घटना तय है!
अगर किसी ऐसे व्यक्ति को अस्पताल में डॉक्टर बनाकर ऑपरेशन थियेटर में भेज दिया जाए जिसने कभी मेडिकल की किताब न पढ़ी हो, तो वह मरीज़ की जान ले लेगा!
लेकिन हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना देखिए: जो व्यक्ति पूरे देश के 140 करोड़ नागरिकों की किस्मत का फैसला करने जा रहा है, जो संसद और विधानसभा में बैठकर बजट और कानून बनाने जा रहा है—उसके लिए कोई न्यूनतम योग्यता नहीं है!
चाहे वह अनपढ़ हो, चाहे उसने अपनी ज़िंदगी में कभी एक दिन भी पसीना न बहाया हो, चाहे उस पर दस मुकदमे दर्ज हों—अगर उसके पास बाहुबल और काला धन है, तो वह चुनाव लड़कर मंत्री बन सकता है और सेना व पुलिस को आदेश दे सकता है!
इसीलिए लेखक एन. सिंह भारतीय राजनीति को सुधारने के लिए एक ऐसा विचार रखते हैं, जिसे सुनकर हर भ्रष्ट नेता की नींद उड़ जाएगी।
जब राष्ट्र सेवा केवल भाषण बनकर रह जाए
आजकल चुनाव जीतने का सबसे आसान तरीका क्या है?
- हाथ में तिरंगा लेकर टीवी पर दो चार जोशीले देशभक्ति के नारे लगा दो!
- मंच से किसी दूसरे देश या किसी दूसरी जाति को गालियां दे दो!
- और भाषण खत्म होते ही अपने एसी कमरे में जाकर बैठ जाओ!
इन नेताओं के अपने बच्चे कभी सेना में भर्ती होने नहीं जाते। वे विदेशों में पढ़ाई करते हैं और फिर सीधे राजनीति में आकर ‘युवा नेता’ बन जाते हैं। देश की सीमा पर खून बहाने के लिए केवल किसान और मजदूर का बेटा जाता है, जिसे महीने के 30-35 हज़ार रुपये मिलते हैं।
जब इन राजनेताओं को यह पता ही नहीं है कि शून्य से 30 डिग्री नीचे सियाचिन की बर्फीली हवा में खड़े होकर पहरा देना क्या होता है, जब उन्होंने कभी अपनी आँखों के सामने अपने साथी को शहीद होते नहीं देखा—तो वे राष्ट्र की कीमत कैसे समझेंगे? उनके लिए राष्ट्र केवल चुनाव जीतने का एक ‘पोस्टर’ है।
एन. सिंह का साहसिक प्रस्ताव
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ में प्रस्ताव रखते हैं कि यदि भारत को सचमुच एक महान और अनुशासित राष्ट्र बनाना है, तो चुनाव लड़ने की योग्यता में एक ऐतिहासिक बदलाव करना होगा:
“संसद या विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए यह अनिवार्य शर्त होनी चाहिए कि उम्मीदवार ने भारतीय सेना में एक सामान्य सैनिक के रूप में कम से कम 5 वर्ष तक निष्कलंक सेवा की हो!”
ज़रा सोचिए, यदि यह नियम लागू हो जाए, तो देश की राजनीति में क्या बदलाव आएगा:
- त्याग और अनुशासन: जब कोई नेता 5 साल तक सरहद की बैरक में एक आम जवान की तरह रहेगा, अपनी थाली खुद धोएगा, और रात में पहरा देगा, तो उसके भीतर का अहंकार और घमंड चूर-चूर हो जाएगा।
- जाति-पाति का खात्मा: सेना में कोई जाति या धर्म नहीं होता। वहाँ सब एक ही वर्दी पहनते हैं, एक ही मेस में खाना खाते हैं और एक-दूसरे की जान बचाने के लिए खड़े होते हैं। 5 साल की इस सेवा के बाद कोई भी नेता जातिवादी राजनीति करने की सोच भी नहीं सकेगा।
- सच्चा राष्ट्रप्रेम: जब उसे पता होगा कि एक गोली किसी की जान कैसे लेती है, तब वह संसद में बैठकर देश के संसाधनों को लूटने से पहले सौ बार सोचेगा।
किताब से मूल उद्धरण
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के 24वें अध्याय में इस विचार को बहुत स्पष्टता के साथ रखते हैं:
“चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम योग्यता सेना में कम से कम 05 वर्ष की नौकरी करने के बाद अनिवार्य होता, तो कितना अच्छा रहता। तो राष्ट्र क्या होता है, इनको ठीक से समझ में आ जाता। यदि इन्हें गोली नहीं लगती, तो तैनाती के दौरान आवाज़ तो ज़रूर ही गोलियों की सुनने को मिल जाती, तब इनके दिमाग में त्याग की भावना निश्चित रूप से अंकुरित होता, लेकिन दुर्भाग्य है कि यहाँ असीम आजादी वाला लोक-लुभावन लोकतंत्र का शासन चल रहा है। ऐसा शासन यदि कुछ दिन तक और चला, तो विघटन भी होना तय है। एक-एक वोट के लिए आपसी भारी वैमनस्यता उभर चुकी है। ये तथाकथित जन-प्रतिनिधि जनता के अंदर विषभाव इस प्रकार भर दिये हैं कि भारतीय समाज अब टूट रहा है…”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 616 / 7363)
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या यह विचार केवल एक कल्पना है, या यह भारत के भविष्य को भ्रष्टाचार और दलाली से बचाने का सबसे अचूक नुस्खा है?
राष्ट्र निर्माण के इस क्रांतिकारी विज़न, सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह के सपनों के भारत और आधुनिक राजनीति की कमजोरियों को गहराई से समझने के लिए विमला सिंह और एन. सिंह की पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का 24वां अध्याय हर भारतीय को पढ़ना चाहिए।
चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम योग्यता सेना में कम से कम 05 वर्ष की नौकरी करने के बाद अनिवार्य होता, तो कितना अच्छा रहता। तो राष्ट्र क्या होता है, इनको ठीक से समझ में आ जाता। यदि इन्हें गोली नहीं लगती, तो तैनाती के दौरान आवाज़ तो ज़रूर ही गोलियों की सुनने को मिल जाती, तब इनके दिमाग में त्याग की भावना निश्चित रूप से अंकुरित होती।