क्या आज भी भारत 'सोने की चिड़िया' है? देशी-विदेशी पूँजीपतियों की नई लूट
एन. सिंह · ·4 मिनट
कक्षा आठ की इतिहास की किताब में आपने ज़रूर पढ़ा होगा कि प्राचीन काल में भारत को ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था।
यहाँ के कपड़े, मसाले, सोना, हीरे और कारीगरी पूरी दुनिया में मशहूर थे। 1498 में जब वास्कोडिगामा भारत के कालीकट बंदरगाह पर उतरा, तो वह यहाँ से जो मसाले अपने देश पुर्तगाल ले गया, उसने उन्हें यूरोप में 60 गुना मुनाफे पर बेचा! उस बेशुमार दौलत को देखकर डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी बनाकर भारत आए। उन्होंने व्यापार के नाम पर धीरे-धीरे पूरे देश पर कब्ज़ा कर लिया और भारत की सारी संपदा लूटकर लंदन भेज दी।
हम सब यह सोचकर खुश हो जाते हैं कि 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज़ चले गए और देश आज़ाद हो गया।
लेकिन लेखक एन. सिंह हमसे एक बहुत तीखा और कड़वा सवाल पूछते हैं: क्या अंग्रेज़ों के जाने के बाद भारत की लूट बंद हो गई? या सिर्फ लुटेरों के चेहरे बदल गए हैं?
10% बनाम 90% की खौफनाक खाई
आज के भारत में एक ऐसा नज़ारा है जो किसी भी संवेदनशील इंसान का दिल दहला देगा:
- एक तरफ वह 10% लोग हैं, जिनके पास देश की 90% संपत्ति और संसाधन जमा हैं। वे अरबों रुपयों के गगनचुंबी महलों में रहते हैं, अपने निजी हवाई जहाज़ों से उड़ते हैं और विदेशों के बैंकों में अपना मुनाफा छुपाते हैं।
- दूसरी तरफ वह 90% आबादी है, जो देश की बची-खुची 10% सुविधाओं के लिए आपस में संघर्ष कर रही है। इसमें गाँव का छोटा किसान है, पसीना बहाने वाला मजदूर है, और एक अदद नौकरी के लिए भटकता नौजवान है।
आज भी हमारे देश की नदियां, खदानें, जंगल, कोयला, बंदरगाह और हवाई अड्डे मुट्ठी भर बड़े उद्योगपतियों को कौड़ियों के भाव सौंपे जा रहे हैं। जब कोई बड़ा उद्योगपति हज़ारों करोड़ का कर्ज़ लेकर डकार जाता है, तो बैंक उसके कर्ज़ को ‘राइट-ऑफ’ (माफ) कर देते हैं। लेकिन अगर गाँव का कोई गरीब किसान 50 हज़ार रुपये का कर्ज़ न चुका पाए, तो बैंक उसके घर की कुर्की कर लेता है और उसकी बेइज्जती करता है!
किताब से कड़वा सच
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के दूसरे अध्याय में इस आधुनिक कॉरपोरेट लूट का पर्दाफाश करते हुए लिखते हैं:
“वास्कोडिगामा के पश्चात् और 17वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से ही भारत में बने ताजमहल और सोने की चिड़िया ‘भारत’ को देखकर यूरोपीय भी अपने को रोक नहीं पाये और व्यापार करने के उद्देश्य से विदेशी कम्पनियाँ भारत आयीं, लेकिन व्यापार के साथ-साथ राजनीतिक आधिपत्य (पॉलिटिकल डॉमिनेंस) उनकी छिपी हुई योजना का भाग था… आज भी भारत लूटा जा रहा है। इसको अंग्रेज़ नहीं, बल्कि यहाँ के लोग दुरभिसंधि करके लूटकर अपना घर भर रहे हैं, तो उस डाकू और इस डाकू में क्या अंतर है। गरीब जनता तो पीसी ही जा रही है।”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 839 व 4397)
देश की विषमता पर वे आगे लिखते हैं:
“देश में एक तरफ बड़े-बड़े महल हैं। 5 सितारा होटलों की चमक है, तो कहीं सड़क के दूसरी ओर श्रम बस्तियाँ हैं। भूख से मरते वृद्ध और बच्चे हैं। एक भारत में दो भारत बस रहे हैं। एक भारत है 10 फीसदी लोगों का, जिनके पास देश की 90 फीसद सम्पत्ति जब्त है और एक भारत है 90 फीसदी लोगों का, जिनके पास 10 फीसदी सम्पत्ति और सुविधाएँ भी बड़ी मुश्किल से पहुँच पाती हैं।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 4684)
इस लूट को रोकने का उपाय
- प्राकृतिक संसाधनों पर जनता का अधिकार: जल, जंगल, ज़मीन और खदानें किसी निजी घराने की बपौती नहीं हैं। इनका इस्तेमाल पूरे देश के कल्याण के लिए होना चाहिए, न कि चुनिंदा कॉरपोरेट्स का मुनाफा बढ़ाने के लिए।
- समान टैक्स प्रणाली और कड़ा नियमन: बड़े उद्योगपतियों पर संपत्ति कर (Wealth Tax) लगाया जाए और उनके द्वारा ली जाने वाली अनुचित छूटों को खत्म किया जाए।
- नेताओं और उद्योगपतियों की सांठगांठ का खात्मा: चुनावी चंदे (Electoral Funding) के नाम पर पार्टियों को मिलने वाले काले धन पर पूर्ण प्रतिबंध लगे ताकि नीतियां उद्योगपतियों के इशारे पर न बनें।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या हम सचमुच एक स्वतंत्र राष्ट्र हैं, या हम ईस्ट इंडिया कंपनी की जगह ‘देशी कंपनियों’ की नई गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं?
भारत के आर्थिक इतिहास, देशी-विदेशी पूंजीपतियों के गठजोड़ और सोने की चिड़िया की इस नई लूट की पूरी कहानी जानने के लिए विमला सिंह और एन. सिंह की पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का दूसरा अध्याय अवश्य पढ़ें।
आज भी भारत लूटा जा रहा है। इसको अंग्रेज़ नहीं, बल्कि यहाँ के लोग दुरभिसंधि करके लूटकर अपना घर भर रहे हैं, तो उस डाकू और इस डाकू में क्या अंतर है। गरीब जनता तो पीसी ही जा रही है।